NavIC: भारत का अपना जीपीएस

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
12 अप्रैल को पीएसएलवी-सी41 (PSLV-C41) के माध्यम से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organization-ISRO) द्वारा IRNSS-1-I नौवहन (Navigation) उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया गया। यह पीएसएलवी के 43 प्रक्षेपणों में से 41वाँ सफल प्रक्षेपण था। यह अभियान इसके एक्सएल (XL) वर्ज़न से प्रक्षेपित किया गया। IRNSS के सातों उपग्रहों से मिलकर ही NavIC बना है। IRNSS अर्थात् इंडियन रीजनल नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम (Indian Regional Navigation Satellite System-IRNSS) इसरो द्वारा विकसित पूर्णतया भारत सरकार के अधीन एक क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जिसे NavIC नाम दिया गया है। 
क्या है IRNSS?
·         इससे पहले कुल सात IRNSS (1A से 1G तक) स्थापित किये जा चुके हैं और 
·         यह IRNSS-1-I इस प्रणाली का नौवाँ उपग्रह है। 
·         इस श्रृंखला का आठवाँ उपग्रह IRNSS-1H तकनीकी खराबी की वज़ह से असफल हो गया था।
·         इस श्रृंखला में पहले उपग्रह का प्रक्षेपण जुलाई 2013 में किया गया था।
·      यह प्रणाली स्वदेशी तकनीक पर आधारित है तथा IRNSS-1-I इसरो की NavIC प्रणाली का हिस्सा है।
आत्मनिर्भरता के लिये स्वदेशी तकनीक का विकास 
भारत का NavIC अमेरिका के GPS (Global Positioning System), रूस के ग्लोनासयूरोप के गलीलियो जैसा है। IRNSS-1-I उपग्रह की सफलता के साथ ही भारत का अपना केवल उपग्रहों का जाल तैयार हो गया है, बल्कि देश के पास अपना GPS भी हो गया है। पूर्ण रूप से सक्रिय होने के बाद GPS के लिये भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा।
कारगिल घुसपैठ के समय भारत के पास ऐसा कोई सिस्टम मौजूद नहीं होने के कारण सीमापार से होने वाली घुसपैठ का समय रहते पता नहीं लगाया जा सका। भारत ने अमेरिका से GPS सिस्टम से सहायता करने का अनुरोध किया गया था, लेकिन तब अमेरिका ने इनकार कर दिया था। उसके बाद से ही GPS की तरह ही स्वदेशी नेवीगेशन सेटेलाइट नेटवर्क के विकास पर ज़ोर दिया गया; और अब भारत ने खुद इसे विकसित कर बड़ी कामयाबी हासिल की है।
 हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर बदलने की चुनौती 
इसरो के वैज्ञानिकों ने जहाँ एक कठिन चुनौती को पूरा करते हुए GPS की अमेरिकी व्यवस्था को चुनौती देने वाला भारतीय सिस्टम तैयार तो कर लिया है, लेकिन इसका तुरंत आम लोगों तक पहुँचना आसान नहीं है। 
NavIC को आम लोगों के उपयोग में लाए जाने वाले उपकरणों में आने में लंबा समय लग सकता है क्योंकि इसके लिये मोबाइल फोन से ले कर नेवीगेशन सिस्टम तक के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में बदलाव करना होगा।
जिन उपकरणों में इस सेवा का उपयोग होना है पहले उन्हें इसके लिये सक्षम बनाना होगा। अभी भारत में उपयोग हो रहे उपकरण केवल GPS को सपोर्ट करते हैं। 
अगर इन पर NavIC को  चलाना है तो हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों में ही बदलाव करना होगा। 
एक बड़ी समस्या यह है कि इनका उपयोग करने वाले लोग और इन्हें बनाने वाली कंपनियाँ पहले इंतजार करेंगे ताकि नई व्यवस्था पर आधारित सेवाएँ अधिक-से-अधिक उपलब्ध हों। 
विभिन्न एप्लीकेशन में NavIC के उपयोग को ले कर प्रयोग किये जा रहे हैं, लेकिन बाज़ार में इसके पूरी तरह सक्रिय होने में अभी कुछ वर्षों का समय और लग सकता है।

IRNSS-1I की विशेषताएँ
·         IRNSS-1-I को भू-समकालिक कक्षा में स्थापित किया गया है। 
·         इसका सबसे नज़दीकी बिंदु पृथ्वी के ऊपर 284 किमी. पर होगा, जबकि सबसे दूरतम बिंदु पृथ्वी के ऊपर 20,650 किमी. पर होगा।
·     इस श्रृंखला के अन्य उपग्रहों में से 3 भू-स्थिर कक्षा में और चार भू-समकालिक कक्षा में स्थापित किये गए हैं।
·    अन्य सभी IRNSS उपग्रहों की तरह IRNSS-1-I में भी दो पेलोड हैं--1. नेवीगेशन पेलोड, 2. रेंजिग पेलोड।
·         नेवीगेशन पेलोड का इस्तेमाल स्थिति, गति तथा समय के निर्धारण के लिये किया जाएगा।
·         रेंजिंग पेलोड का इस्तेमाल उपग्रह की आवृत्ति रेंज का निर्धारण करने के लिये किया जाएगा।
·         IRNSS-1-I उपग्रह IRNSS-1-A का स्थान ले सकता है जो उन 7 नेवीगेशन उपग्रहों में से एक है जो तकनीकी खामी (इसकी तीनों परमाणु घड़ियों ने काम करना बंद कर दिया था) के बाद निष्प्रभावी हो गया था। 

परमाणु घड़ियाँ क्या हैं?: GPS सैटेलाइट बहुत ही उन्नत तकनीक से डिज़ाइन की जाती है ताकि इससे प्राप्त  होने वाली कोई भी सूचना 100% सही हो। इसीलिये GPS सैटेलाइट में परमाणु घड़ियों (Rubidium Clocks) का इस्तेमाल होता है। यह घड़ी एक सेकेंड के 10 करोड़वें हिस्से की गणना करने की क्षमता रखती है और समय की इतनी सही गणना कई जगहों पर बेहद ज़रूरी हो जाती है। 
·    अमेरिकी GPS संकेतों की सटीकता का स्तर भारत में लगभग 60-70% प्रतिशत है। IRNSS प्रणाली के पूर्ण रूप से सक्रिय होने के बाद संकेतों की सटीकता का स्तर 90-95% तक हो जाएगा। 
·         NavIC प्रणाली जब पूर्ण सुचारू तरीके से अपना काम करने लगेगी तो भारत की अमेरिकी GPS पर निर्भरता कम हो जाएगी। 
·    1425 किलोग्राम वज़नी IRNSS-1-I उपग्रह का निर्माण इसरो के सहयोग से बंगलुरू की निजी कंपनी अल्फा डिज़ाइन टेक्नोलॉजीस ने किया है। निजी उद्यम द्वारा बनाया गया यह दूसरा उपग्रह है। 
·         उपग्रह बदलने के लिये यह प्रक्षेपण इसरो का दूसरा प्रयास है। इससे पहला उपग्रह IRNSS-1-H को कक्षा में स्थापित करने का पिछले वर्ष का प्रक्षेपण असफल रहा था। 
·        NavIC का उद्देश्य देश तथा देश की सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी तक के हिस्से (दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े हिस्से में) में सटीक स्थैतिक जानकारी उपलब्ध कराना है। 

कैसे काम करता है अमेरिका का GPS?
·         GPS एक बहुउपयोगी अंतरिक्ष-आधारित रेडियो नेवीगेशन सिस्टम है जो अमेरिकी सरकार के स्वामित्व में है और वहाँ की वायु सेना द्वारा संचालित किया जाता है। 
·         अमेरिका ने अपनी नौसेना की मिसाइलों को ले जाने वाली पनडुब्बियों को ट्रैक करने के लिये 1960 के दशक के मध्य में इस GPS  प्रणाली का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। 
·         अमेरिकी रक्षा विभाग ने 1970 की शुरुआत में एक मजबूत, स्थिर उपग्रह नेवीगेशन सिस्टम को सुनिश्चित करने के लिये उपग्रहों का उपयोग करने का निर्णय लिया था।
·         इसके बाद अमेरिका ने 1978 में Timing and Ranging (NAVSTAR) उपग्रह के साथ अपना पहला नेवीगेशन सिस्टम लॉन्च किया।
·         24 उपग्रहों का यह  सिस्टम 1993 में पूरी तरह से चालू हो गया और और इसमें अधिकतम 32 उपग्रह शामिल किये जा सकते हैं।
·         GPS सीधे उपग्रह से जुड़ा होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशों के आधार पर काम करता है। 
·         GPS उपकरण उपग्रह से प्राप्त संकेतों की सहायता से उस जगह को मैप में दर्शाता रहता  है। 
·         वर्तमान में GPS तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है--स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूज़र सेगमेंट।
·         GPS रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन पृथ्वी के ऊपर स्थित उपग्रहों द्वारा भेजे जाने वाले संकेतों के आधार पर करता है। 
·         प्रत्येक उपग्रह निरंतर संकेत प्रसारित करता रहता है और रिसीवर प्रत्येक संकेत का ट्रांजिट समय नोट करता है और प्रत्येक उपग्रह से दूरी की गणना करता है। 
·         बेहतर गणना के लिये रिसीवर चार उपग्रहों का इस्तेमाल करता है। इससे यूज़र की 3-डी स्थिति (अंक्षाश, देशांतर रेखा और उन्नतांश) के बारे में पता चल जाता है। 
·         स्थिति का पता चलने के बाद GPS यूनिट स्पीड, ट्रैक, ट्रिप, दूरी, जगह से दूरी, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के बारे में जैसी अन्य जानकारियाँ एकत्र कर लेता है। 
अमेरिकी सेना का है इस पर नियंत्रण
बेशक हमारे-आपके स्मार्टफोन में GPS की सुविधा है, लेकिन व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली GPS की सुविधा पर नियंत्रण अमेरिकी सेना का है। फोन में गूगल मैप्स से लेकर वाहनों के गार्मिन (Garmin)  की GPS प्रणाली पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। इस अमेरिकी प्रणाली में 24 उपग्रह पृथ्वी के 26 हज़ार 600 किमी. की ऊँचाई से दुनियाभर में चप्पे-चप्पे पर नज़र रखते हैं। 
·         GPS का ऐसे कई कामों के लिये भी उपयोग किया जाता है, जिनके लिये इसे डिज़ाइन नहीं किया गया था...
·         GPS से किसी लोकेशन को ट्रैक करना इसका मुख्य और सबसे आम उपयोग है। 
·         किसी दुर्घटना या इमरजेंसी के समय तत्काल सहायता पहुँचाने के लिये वर्तमान लोकेशन का पता लगाने हेतु।
·         गाड़ी में GPS ट्रैकर लगा है तो चोरी हो जाने पर उसे ढूंढना आसान हो जाता है।
·         मैपिंग और सर्वेक्षण के कार्यों में इसका उपयोग किया जा सकता है। 
·         अपराधियों का पीछा करने में पुलिस और जांचकर्त्ताओं द्वारा भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

NavIC के प्रमुख अनुप्रयोग
·    सैन्य और कूटनीतिक दृष्टि से होने वाले फायदों के अलावा NavIC के कई व्यावसायिक और सामाजिक लाभ भी होंगे। 
·    आस-पड़ोस के देशों को GPS सुविधा दी जा सकती है जिससे पड़ोसी देशों को मौसम संबंधी पूर्वानुमान, मैंपिग जैसी सुविधाएँ देकर सरकार को आय हो सकती है। 
·         देश के दूर-दराज के इलाकों पर GPS की मदद से नज़र रखी जा सकेगी। 
·         देश के अलग-अलग इलाकों में चल रही अवसंरचना परियोजनाओं की रीयल टाइम मैंपिग की जा सकती सकेगी। 
·      सड़क और रेल यातायात पर भी GPS सिस्टम का अच्छा असर पड़ेगा। सड़क पर लगे ट्रैफिक जाम का पहले से जानकारी लेकर वैकल्पिक मार्ग सुझाए जा सकते हैं और देर से चल रही ट्रेनों की रीयल टाइम ट्रैकिंग की जा सकती है। 
·         व्यवसायिक रूप से लंबी दूरी तय करने वाले भारतीय मालवाहक जहाज़ों को भी इससे फायदा होगा, क्योंकि इसकी मदद से ज़्यादा सुरक्षित सफर को पहले चुना जा सकता है। 
·         आपदाओं के समय मलबे में दबे लोगों का पता लगाया जा सकता है। 
NavIC की कार्यप्रणाली 
·         NavIC के उपग्रह दो माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी बैंड पर सिग्नल देते हैं, जो L5 और S के नाम से जाने जाते हैं। 
·         यह स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस तथा रिस्ट्रिक्टेड सर्विस की सुविधा प्रदान करता है। 
·         इसकी 'स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस' सुविधा भारत में किसी भी क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति की स्थिति बता सकती है।
·         इसकी 'रिस्ट्रिक्टेड सर्विस' सेना तथा महत्त्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के लिये सुविधाएं प्रदान करने का काम करती है।
·         सेटेलाइट रेंजिंग और निगरानी, जेनरेशन और नेवीगेशन मानदंड के प्रसारण के लिये कुछ ज़मीनी सुविधाएँ बहाल करनी होती हैं। इस तरह की सुविधाएँ देश भर में 18 जगहों पर स्थापित की जा रही हैं।

भारत के आगामी महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष अभियान 
आने वाले वर्षों में इसरो के वैज्ञानिकों ने उपग्रह प्रक्षेपण की श्रृंखला तैयार कर रखी है:
मिशन चंद्रयान-2: अगली प्रमुख परियोजना भारत का चंद्रमा पर दूसरा अन्वेषण मिशन, चंद्रयान-2 भेजना है। इसके चंद्रमा की धरती का खनिज विज्ञान संबंधी और तात्त्विक अध्ययन करने की उम्मीद है। इसे 2018 के अंत तक छोड़ने की तैयारी है। चंद्रयान-2 एक चुनौतीपूर्ण मिशन है, क्योंकि इसमें एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और एक रोवर को चंद्रमा पर ले जाना है। चंद्रयान-2 का कुल भार 3290 किलोग्राम है। लॉन्च होने के एक से दो महीनों में यह यान चंद्रमा की कक्षा तक पहुँच जाएगा। उल्लेखनीय है कि भारत ने 10 वर्ष पूर्व चंद्रयान-1 सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था। चंद्रमा की कक्षा तक पहुँचने के बाद लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा और चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास लैंडिंग करेगा। लैंडर के अंदर लगे 6 पहिए वाले रोवर अलग हो जाएंगे और चंद्रमा की सतह पर आगे बढ़ेंगे। रोवर को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह चंद्रमा की सतह पर 14 दिन तक रह पाएगा और 150-200 किमी. तक चलने में सक्षम होगा। रोवर चंद्रमा की सतह का परीक्षण करेगा और वहां से 15 मिनट में तस्वीरें धरती पर भेजेगा। 14 दिनों के बाद रोवर स्लीप मोड पर चला जाएगा और सूर्य का प्रकाश पड़ने पर दोबारा काम करने लगेगा। 
आदित्य-L1: इसरो की अगली बड़ी योजना सौर प्रभामंडल (कोरोनाग्राफ के साथएक टेलीस्कोप), फोटोस्फेयर, वर्णमंडल (सूर्य की तीन प्रमुख बाहरी परतें) और सौर वायु का अध्ययन करने के लिये सूर्य में वैज्ञानिक मिशन भेजना है। श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-एक्सएल द्वारा इसे 2020 में छोड़ा जाना प्रस्तावित है। आदित्य-L1 उपग्रह कक्षा से सूर्य का अध्ययन करेगा जो पृथ्वी से करीब 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर है। आदित्य-L1 मिशन इस बात की जाँच करेगा कि क्यों सौर चमक और सौर वायु पृथ्वी पर संचार नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स में बाधा पहुँचाती है। इसरो की उपग्रह से प्राप्त उन आँकड़ों का इस्तेमाल करने की योजना है ताकि वह गर्म हवा और चमक से होने वाले नुकसान से अपने उपग्रहों का बेहतर तरीके से बचाव कर सके।
मिशन वीनस: भारत पहली बार शुक्र ग्रह का अन्वेषण करने की भी तैयारी कर रहा है। इस योजना के तहत शुक्र पर भेजे जाने वाले ऑर्बिटर को पहले उसकी दीर्घ वृत्ताकार कक्षा में स्थापित किया जाएगा और इसके बाद उसे शुक्र ग्रह के करीब लाया जाएगा। शुरुआती योजना के अनुसार 175 किलोग्राम वज़नी एक वैज्ञानिक उपकरण यान के साथ भेजा जाएगा, जो 500 वॉट ऊर्जा से चालित होगा। इसके बाद मिशन पर विस्तृत अध्ययन होगा। 
1963 में अमेरिका ने मैरीनर-2 रोबोटिक स्पेस प्रोब भेजा था तथा उसके बाद 1970 में सोवियत संघ का अंतरिक्ष यान वेनेरा-7शुक्र की सतह पर उतरा और काफी आँकड़े पृथ्वी पर भेजे। 1978 में नासा की शुक्र पर पायनियर वीनस परियोजना से भी शुक्र के बारे में काफी जानकारियाँ मिली। 1980-90 के बीच शुक्र पर कई फ्लाई-बाई मिशन भेजे गए। अप्रैल 2006 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने शुक्र पर दीर्घावधि मिशन के तहत वीनस एक्सप्रेस भेजा। वहीं, इससे पहले 2015 में जापान ने अपना मिशन अकात्सुकी भेजा।
मंगल मिशन-2 (MOM-2): भारत संभवतः 2021-2022 के दौरान दूसरे मंगल ऑर्बिटर मिशन के साथ लाल ग्रह पर दुबारा कदम रखने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले इसरो ने वर्ष 2013 में केवल 450 करोड़ रुपए की लागत से मंगल ग्रह पर मिशन भेजा था, जो अभी भी इस लाल ग्रह की कक्षा में चक्कर लगा रहा है। इसरो का मंगल मिशन-2 पूर्णतः वैज्ञानिक मिशन होगा, जबकि पहला मंगल अभियान भारत की शानदार इंजीनियरिंग उपलब्धि थी, जिसने भारत को यह सिखाया कि लाल ग्रह तक कैसे पहुँचना है और वहाँ से करोड़ों किलोमीटर दूर पृथ्वी पर उसके आँकड़े कैसे प्राप्त करने हैं। इस दूसरे मंगल मिशन में उपग्रह को मंगल की 200x200 किलोमीटर वाली कक्षा में स्थापित करने की योजना है। इसे जीएसएलवी प्रक्षेपण यान से भेजा जाएगा ताकि उपग्रह को उन्नत और तीक्ष्ण उपकरणों से लैस किया जा सके। यह मिशन बेहतर प्रयोगों को अंजाम देगा।

निष्कर्षकम संसाधनों और कम बजट के बावजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित करने में लगा हुआ है। भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत का लगभग एक-तिहाई है। अंतरिक्ष में लंबे समय से चला रहा अमेरिका और चीन का दबदबा टूट चुका है तथा चीन और भारत इस मैदान के नए खिलाड़ी बनकर उभरे हैं। भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में तब कीर्तिमान बनाया था जब उसने अपने मंगल अभियान को पहली ही बार में सफलतापूर्वक पूरा किया। इस उपलब्धि के बाद भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ की एजेंसी के बाद चौथी ऐसी एजेंसी बन गई जिसने यह सफलता हासिल की। चंद्रयान और मंगलयान की सफलता के बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनियाभर में भारत की धाक तो जमा ही दी है, इसके साथ ही NavIC के पूर्ण रूप से कार्यरत होने बाद देश के करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी भी बदल जाएगी।

साम्यवादी चोगे में पूंजीवाद

चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है...


वायरस संक्रमण ड्रैगन की ऐसी छींक है जिससे दुनिया भर में सरकारों का दम फूल रहा है और मानवता का गला रुंधने लगा है। जैसे चीन विश्व का दोषी है, वैसे ही हमारे पड़ोस में भी कुछ दोषी होंगे। चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है। 
रोग फैलाने के लिए दुनिया और भारत के सबसे बड़े कारक चिन्हित हुए। अपने यहां एक और पक्ष है, विरोध के खूंटे से बंधा विपक्ष, जो संकट के समय भी अपनी प्रकृति नहीं छोड़ता। इसलिए अच्छा हो कि उनके हवा-हवाई विरोध और सामाजिक संवेदनशीलता एवं वैज्ञानिकता को चिढ़ाते सुझावों पर मगज मारना छोड़कर समस्या के वैश्विक मूल, यानी चीन का रुख करें।

WHO का नाम चायनीज हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कर देना चाहिए। अगर WHO दुनिया से ये नहीं कहता कि चीन में कोई निमोनिया महामारी नहीं है, तो हर देश ने सावधानी बरती होती...WHO, जो एक वैश्विक संगठन है, ताइवान को अपने साथ शामिल तक नहीं करता।  - तारो आसो, उप प्रधानमंत्री जापान
                                   
हैरानी की बात है कि जो महामारी क्षेत्रीय उत्पात से अंतरराष्ट्रीय चक्रवात तक कद बढ़ा चुकी है, चीन चाहता है कि अभी भी उसका ठीक नामकरण न किया जाए। डॉक्टरों-वैज्ञानिकों, सबका कहना है कि कोरोना और भी कई तरह का होता है, फिर वुहान से फैले इस महाविनाशक विषाणु को चाइनीज वायरस क्यों ना कहा जाए!

सबसे पहले इसका खुलासा करने वाले डॉक्टर ली वेन लियांग से मृत्यु पूर्व जबरन इसका खंडन कराने, विषाणु की बात दबाने और मृतकों की संख्या पर लीपापोती के आरोपी चीन की बेचैनी समझ आती है। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसके लिए विभिन्न देशों से संपर्क कर चिंता जताते हुए वायरस को 'चायनीज वायरस' ना कहने की नसीहत भी दी। लेकिन यह सोचना कि चीन बदनामी के डर से ऐसा कर रहा है, मूर्खता ही होगी। 

चीन को बदनामी से कोई फर्क पड़ता तो एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2018 में प्रकाशित उस रिपोर्ट से वह पानी-पानी हो गया होता, जिसके अनुसार विश्व भर में कुल जितने लोगों को मृत्युदंड दिया गया उससे ज्यादा सजाएं अकेले चीन में दी गईं।
किसी भी बदनामी से बेपरवाह चीन आज दुनिया की ऐसी विस्तारवादी शक्ति है जिसने साम्यवादी चोगा तो पहना हुआ है, लेकिन उसके प्राण पूंजीवाद, शोषण और सिर्फ मुनाफे में बसते हैं। यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि चीन को बदनामी नहीं सिर्फ अपने आर्थिक नुकसान से फर्क पड़ता है, और यही बात उसे समझ आती है।

आप संकट के समय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की कसौटी पर इस बात को माप कर देखिए। आप पाएंगे कि:
1. मार्च 2020 में जिस समय दुनिया भारी उथल-पुथल से कांप रही थी, उस समय भी चीन 12 वाटर ड्रोन के सहारे दक्षिणी चीन सागर से बढ़ते हुए हिंद महासागर तक की अहम जानकारियां बटोरने में लगा था।
2. दुनिया को जिस समय चिकित्सकीय उपकरणों आदि की भारी किल्लत थी, उस समय चीन घटिया गुणवत्ता की सामग्री विदेशों में खपाने में जुटा था।
3. जिस समय दुनिया वैश्विक महामारी पर गंभीरता से चर्चा करना चाहती थी, उस समय चीन का बगल-बच्चा बना विश्व स्वास्थ्य संगठन  विश्व मंच पर वैश्विक महामारी की चर्चा ना होने देने का खेल खेल रहा था।

तो फिर चीन की चिंता का कारण क्या है? इस चिंता को समझने के लिए वर्तमान WHO के पद समीकरणों के साथ कम्युनिस्ट आंदोलन के गर्भनाल संबंधों को समझना होगा।

इसे खुद से सवाल पूछते हुए कुछ यूं समझें कि, चीन की राजकीय चिंता विश्व मीडिया की चुप्पी क्यों बन गई? 

क्या बीजिंग की हनक या वायरस की मारक क्षमता ने मीडिया की मुखरता भी छीन ली! 

ऑस्ट्रेलियाई अखबार डेली टेलीग्राफ ने जरूर चायनीज वायरस के मुद्दे पर चीन से आक्रोश पत्र प्राप्त होने पर इसकी सार्वजनिक बखिया उधेड़ी, किंतु मीडिया के बड़े हिस्सों में इस पर मौन क्यों बना रहा,

 और क्यों विश्व स्वास्थ्य संगठन और इसके महानिदेशक की कार्यप्रणाली पर जो सवाल उठने चाहिए थे, वे उठे ही नहीं? 

इसका जवाब मीडिया में चीनी कम्पनियों के निवेश, विज्ञापन बजट, यूसी ब्राउजर जैसे पत्रकार प्रशिक्षण और समाचार सेवा के लबादे में मनचाही खबरों को छांटने-दबाने के औजारों में छिपा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस अधानम (जिनका हिंसक/आतंकी कम्युनिस्ट आंदोलन से साफ जुड़ाव रहा) के मुद्दे पर आज मीडिया का मौन एक पहेली जैसा है।  महानिदेशक बनने से ठीक पहले टेड्रोस इस बात को लेकर सुर्खियों में थे कि उन्होंने इथियोपिया में हैजे जैसी महामारी को बिना वैज्ञानिक जांच के, 'पानी से फैलने वाली पेचिश' बताकर मामला दबाने का कारनामा कर दिखाया था। 
इतना ही नहीं, आरोप थे कि उन्होंने तीन अलग-अलग वर्षों में बार-बार यह काम किया। टेड्रोस के उग्रवादी कम्युनिस्ट दल से जुड़ाव के इतिहास को देखते हुए इथियोपिया के कई दलों ने डब्ल्यूएचओ में उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया था, लेकिन साथ ही कम्युनिस्ट टैग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ने उनकी उम्मीदवारी के लिए लाखों डॉलर भी खर्च किए थे। शायद यह कम्युनिस्ट जुड़ाव ही था जिसकी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीनी एजेंसियों की भ्रामक रिपोर्ट पर मुहर लगाते हुए दुनिया भर में ट्विटर के जरिए यह मुनादी कर दी कि चायनीज वायरस इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता।
दरअसल यही वह बिंदु है जहां चीन की बेचैनी का बीज छिपा है। यही वह बिंदु है जहां चीन और WHO से जवाब—तलब करने और विश्व मानवता को हुई क्षति के लिए हजार्ना मांगने के लिए घेराबंदी की जरूरत है। 
महामारी से अधूरे-अनमने ढंग से निपटने, डॉक्टर ली वेन लियांग जैसे सूचना के हरकारे को खामोश करने और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं का दुनिया को अंधेरे कुएं में धकेलने के औजार के रूप में उपयोग करने के प्रथम दृष्टया साक्ष्य दुनिया के सामने उजागर हो रहे हैं।
इस विषाणु के आघात को झेलने के बाद विश्व व्यवस्था का चेहरा चाहे जो हो, किंतु यदि उसके हृदय में न्याय और संवेदनशीलता की आग बुझ गई, दोषियों को दण्ड न मिला तो यह दुनिया के उस सपने का मर जाना होगा जिसे हम सब देखते हैं। 
इसलिए, चायनीज वायरस की रोकथाम और राहत कार्यों से छुट्टी पाने के बाद दुनिया को न्याय पाने के लिए कमर कसनी होगी।



Your Response to Mistakes Defines You

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Sometimes we lose our way.
We all make mistakes. We focus on the wrong things. We pursue goals at all costs. We teeter on ethical and moral cliffs. We get too far down a slippery slope. We steal. We cheat. We lie. We deceive others. We deceive ourselves. We don’t open ourselves up to our friends. We see crime or fraud and don’t speak out.
You can be a good person and still exercise poor judgment.
In these moments, we’re not the friend others deserve, the partner others choose, the child our parents raised, the exemplar we wish to be, nor the person we’re capable of being.
It can happen to the best of us. We’re human. We all make mistakes.

Just because we’ve lost our way doesn’t mean that we are lost forever. In the end, it’s not the failures that define us so much as how we respond.

A teen who gets in trouble with the law, for example, can accept responsibility for his actions, change his behavior, and go on to lead the nation, or he can see only failure and tumble into a vicious cycle of committing ever-larger crimes.Just because we’ve lost our way doesn’t mean that we are lost forever. In the end, it’s not the failures that define us so much as how we respond. We all get steered off course at some point in our lives. What really counts isn’t that we make mistakes but the choices that follow those mistakes.
It’s not that you stumble, it’s that you get back up. It’s not that you did something wrong but that you realize what’s happening and change. It’s not that you messed up as a friend or lover, it’s that you see ways you can be better. Having the wrong priorities is bad enough, but realizing that and refusing to change is worse. It’s not that you never took the time to smell the roses and admire the sunset; it’s that once you realize this, you take the time to notice.

“Success is never final. Failure is never fatal. It’s courage that counts.”

— John Wooden
Mistakes are bad, no doubt, but not learning from them is worse. The key to learning from mistakes is to admit them without excuses or defensiveness, rub your nose in them a little, and make the changes you need to make to grow going forward. If you can’t admit your mistakes, you won’t grow.

Warren Buffett: The Three Things I Look For in a Person

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Students often go to visit Warren Buffett. And when they do, he often plays a little game on them.
He asks each student to pick a classmate. Not just any classmate, but the classmate you would choose if you could have 10% of their earnings for the rest of their life. Which classmate would you pick and why?
“Are you going to pick the one with the highest IQ?” asks Buffett. “Are you going to pick the guy who can throw a football the farthest? The one with the highest grades? What qualities will cause you to pick them?”
Then he changes things up again. Who would you think least likely to succeed? Why?
He asks the students to take out a sheet of paper and list the positive attributes on the left and the negative ones on the right.
Inevitably, the most useful qualities have nothing to do with IQ, grades, or family connections. People pick based on generosity, kindness, and integrity.
He then asks the students which of the qualities they are incapable of having and which they are incapable of stopping?
“To Buffett, the answer is none,” writes Michael Eisner in Working Together: Why Great Partnerships Succeed. “These qualities are choices people make. People decide whether or not to be generous, they decide whether or not to take credit for things they didn’t do, whether or not to keep score in life, whether or not to be envious.”
It’s quite simple in the end. Develop qualities from the left and try to stop doing the ones on the right.
“You’re looking for three things, generally, in a person,” says Buffett. “Intelligence, energy, and integrity. And if they don’t have the last one, don’t even bother with the first two. I tell them, ‘Everyone here has the intelligence and energy—you wouldn’t be here otherwise. But the integrity is up to you. You weren’t born with it, you can’t learn it in school.”
Buffett and Munger were fortunate. They were both smart and worked hard to improve that advantage. The integrity, however, they choose.
“You decide to be dishonest, stingy, uncharitable, egotistical, all the things people don’t like in other people,” argues Warren. “They are all choices. Some people think there’s a limited little pot of admiration to go around, and anything the other guy takes out of the pot, there’s less left for you. But it’s just the opposite.”