Indian Administrative Service (IAS)



भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस)-
ब्रिटिश काल में भारतीय प्रशासनिक सेवाओं को आई.सी.एस. (Indian Civil Service- ICS) के नाम से जाना जाता था। ध्यातव्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं में आईएएस सर्वाधिक लोकप्रिय सेवा है, यही वजह है कि सिविल सेवा परीक्षा में सफल होने वाले अधिकांश अभ्यर्थियों की पहली पसंद भारतीय प्रशासनिक सेवा ही होती है।

चयन प्रक्रिया :
·    हर साल संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वालीसिविल सेवा परीक्षाके माध्यम से अखिल भारतीय सेवाओं और विभिन्न केंद्रीय सिविल सेवाओं के लिये योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाता है। 
·     सिविल सेवा परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों को उनके प्राप्तांकों और मुख्य परीक्षा के फॉर्म में उनके द्वारा निर्धारित सेवाओं के वरीयता क्रम के आधार पर ही किसी सेवा के लिये चयनित किया जाता है।
·       आईएएस की सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए ही देश के लाखों युवाओं के बीच इसके प्रति ज़बरदस्त आकर्षण है। हर साल देश भर से लाखों युवा सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होते हैं लेकिन उनमें से कुछ-सौ या हज़ार युवा ही इसमें सफल होते हैं। 
·      हर साल इस परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवारों में से लगभग 100 को हीभारतीय प्रशासनिक सेवामें जाने का अवसर मिलता है। ज़ाहिर है कि एक तरफ जहाँ इसके प्रति अत्यधिक क्रेज़ है, तो वहीं इसमें सफलता पाने के लिये कठिन मेहनत भी करनी पड़ती है। 
·     आईएएस बनने के लिये सिर्फ सिविल सेवा परीक्षा पास करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके लिये ऊँची रैंक प्राप्त करना भी आवश्यक है। दरअसल, इस सेवा में कार्य करने और आगे बढ़ने के इतने अवसर होते हैं कि हर कोई इसके प्रति आकर्षित होता है। डॉक्टर, इंजीनियर तथा आई.आई.एम. से पढ़े हुए उम्मीदवार भी आईएएस बनने का सपना संजोए इस परीक्षा में अपनी किस्मत आज़माते हैं और सफल भी होते हैं|
शैक्षिक योग्यता:
·         सिविल सेवा परीक्षा में भाग लेने के लिये उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से स्नातक (Graduation) होना अनिवार्य है|
प्रशिक्षण :
·      भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों का प्रशिक्षण ब्रिटिशकाल से लेकर अब तक आवश्यकतानुसार परिवर्तित होता रहा है। वर्तमान में इस सेवा के अधिकारियों का प्रशिक्षण निम्नलिखित चरणों में पूरा होता है-
1.
आधारभूत प्रशिक्षण - 16 सप्ताह (मसूरी, उत्तराखंड )
2.
व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण-I) - 26 सप्ताह (मसूरी)
3.
राज्य स्तर पर प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) - 52 सप्ताह
   
संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- I) - 3 सप्ताह
   
विभिन्न कार्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) - 45 सप्ताह
   
संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- II) - 4 सप्ताह
4.
व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण- II) - 9 सप्ताह
आधारभूत प्रशिक्षण :
·     सिविल सेवा परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय विदेश सेवा तथा केन्द्रीय सेवा वर्गके भावी अधिकारी सम्मिलित हैं, को एक-साथलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी (उत्तराखंड)’ में 16 सप्ताह का आधारभूत प्रशिक्षण दिया जाता है। 
·     यहाँ इन सेवाओं के प्रशिक्षु अधिकारी एक साथ प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। इससे इन प्रशिक्षु अधिकारियों में आपसी सामंजस्य तथा एकता का भाव पैदा होता है। 
·       प्रशिक्षण कार्यक्रम कई चरणों में संपादित होता है जो कठिन प्रकृति का होने के साथ-साथ रुचिकर भी होता है। 
·     आधारभूत प्रशिक्षण (Foundational Course) में प्रशिक्षु अधिकारियों को भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, भारत का संविधान एवं प्रशासन, राजनीतिक सिद्धांत, लोक प्रशासन, विधि, आधारभूत अर्थशास्त्र एवं जनसंख्या अध्ययन और हिन्दी भाषा का अध्ययन करवाया जाता है। यह प्रशिक्षण मूलतः ज्ञान आधारित होता है। 
·      इस प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य प्रशिक्षु अधिकारियों में अपेक्षित कौशल, ज्ञान तथा अभिवृत्ति का विकास करना तथा भारतीय परिवेश एवं मूल्यों को जानने के लिये अन्य सेवाओं के साथ समन्वय का भाव सिखाना होता है ताकि ये आने वाली बड़ी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिये प्रशिक्षित हो सकें। 
·    आधारभूत प्रशिक्षण के पश्चात् आईएएस संवर्ग के प्रशिक्षु अधिकारी अकादमी में ही रहते हैं, जबकि अन्य सेवाओं के प्रशिक्षु अधिकारी अपने-अपने प्रशिक्षण संस्थानों में चले जाते हैं।
व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण -I) : 
·          आधारभूत प्रशिक्षण के बाद 26 सप्ताह का आईएएस व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण -I) शुरू होता है।
·     प्रशिक्षण का यह भाग कौशल उन्मुख होता है। इसमें इन्हें आवश्यक अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज़मीनी सच्चाई से भी रूबरू कराया जाता है। 
·         इस प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों को विभिन्न दलों में बाँटकर दो सप्ताह के लिये भारत भ्रमण कराया जाता है ताकि ये देश की सांस्कृतिक विविधता से परिचित हो सकें और देश के प्रति इनकी समझ अधिक परिपक्व हो सके। 
·        इस दौरान इन्हें देश की संसदीय व्यवस्था का व्यावहारिक अनुभव भी कराया जाता है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री जैसे गणमान्य व्यक्तियों से मिलने का अवसर भी इसी चरण का हिस्सा है।
राज्य स्तर पर प्रशिक्षण (ज़िला प्रशिक्षण) :
·         मसूरी में आधारभूत तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण-I) पूरा करने के पश्चात् इन प्रशिक्षु अधिकारियों को इन्हें आवंटित राज्य में भेज दिया जाता है।    
·       इसके पश्चात् 52 सप्ताह यानी एक वर्ष काज़िला स्तरीय प्रशिक्षणशुरू होता है, जिसमें प्रशिक्षुओं को आवंटित राज्य के किसी एक ज़िले में जाकर कार्य करना होता है।
·        इस प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षुओं को राज्य प्रशासनिक अकादमी में 3 सप्ताह का संस्थागत प्रशिक्षण (चरण- I) दिया जाता है। 
·      यहाँ प्रशिक्षुओं को राज्य के प्रशासनिक तंत्र की महत्त्वपूर्ण बातें समझाई जाती हैं। इस संस्थागत प्रशिक्षण के पश्चात् प्रशिक्षु अधिकारियों, जिन्हेंप्रोबेशनर’ (Probationer) कहा जाता है, को वास्तविक प्रशासनिक अनुभव हासिल कराने के लिये विभिन्न कार्यालयों में संलग्न किया जाता है। इसे ज़िला प्रशिक्षण कहते हैं। 
·    इस दौरान इन्हें सामान्य कानून एवं नियम, कार्मिक प्रशासन, वित्तीय प्रशासन, राजस्व प्रशासन, भू-सुधार, नियोजन एवं विकास का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक अनुभव कराया जाता है। 
·       प्रशिक्षण प्राप्त करते समय प्रशिक्षु अधिकारियों को व्यावहारिक स्तर पर आने वाली समस्याओं तथा शंकाओं का समाधान ज़िलाधीशों के मार्गदर्शन में होता है। 
·       इस चरण का मुख्य उद्देश्य यह है कि प्रशिक्षु अधिकारी प्रशासनिक ढाँचे को समझें तथा वहाँ के लोगों, उनके प्रतिनिधियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों से संवाद कर विकास के अवसरों और नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों को समझ सकें।
·      राज्य स्तर पर प्रशिक्षण के अन्तिम चरण में पुनः राज्य प्रशासन अकादमी में 4 सप्ताह का संस्थागत प्रशिक्षण (चरण-II) दिया जाता है।
·         इस दौरान सभी प्रशिक्षु अपने राज्य प्रशिक्षण की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हैं।
व्यावसायिक प्रशिक्षण (चरण- II) : 
·     राज्य में प्रशिक्षण समाप्त करके सभी आईएएस प्रशिक्षणार्थी पुनः मसूरी लौट आते हैं। फिर यहाँ आईएएस व्यावसायिक प्रशिक्षण चरण-II शुरू होता है जो 6 सप्ताह का होता है। 
·         इस चरण में प्रशिक्षु क्षेत्र अध्ययन (Field work) के दौरान अर्जित व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर प्रशासन की अच्छाइयों और बुराइयों से सभी को अवगत कराते हैं।  
·         इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य आईएएस अधिकारी के रूप में प्रशिक्षणार्थियों को शारीरिक-मानसिक रूप से तैयार करना, उनमें विश्लेषण, लेखन तथा संचार क्षमता विकसित करना, प्राप्त ज्ञान को अद्यतन करना, कम्प्यूटर शिक्षा देना, राजभाषा में योग्य बनाना तथा आत्मविश्वास से युक्त श्रेष्ठ अधिकारी बनाना है। 
·    अंत में, प्रशिक्षु अधिकारियों की एक लिखित परीक्षा भी होती है जो अकादमी द्वारा आयोजित की जाती है। इसका संचालन यूपीएससी करता है।  
·       इस परीक्षा में सफलता प्राप्त करने तथा एक वर्ष या 18 माह (प्रत्येक राज्य का वास्तविक काल भिन्न होता है) की सेवा पूर्ण कर लेने के पश्चात् ही सेवा में उनकी स्थायी नियुक्ति की जाती है।
·      इस प्रकार, औपचारिक आरंभिक प्रशिक्षण समाप्त हो जाता है तथा प्रत्येक अधिकारी को उसके निर्धारित कैडर में भेज दिया जाता है। हालाँकि, यह आरंभिक प्रशिक्षण ही होता है, इसके बादमिड कॅरियर ट्रेनिंग प्रोग्रामके तहत सेवाकाल के बीच में भी कई बार प्रशिक्षण दिया जाता है। 
नियुक्ति
·         नियुक्ति के पहले वर्ष में प्रशिक्षण का एक नियमित कार्यक्रम होता है। इसके पश्चात् उन्हें एक अनुभाग (Sub-division) सौंप दिया जाता है। उनके अनुभव एवं ज्ञान को समृद्ध करने के लिये प्रति दो वर्ष कार्य कर लेने के पश्चात् उनका स्थानांतरण एक ज़िले से दूसरे ज़िले में किया जाता है।
·         इसके अलावा, अवर सचिव (Under Secretary) के रूप में उन्हें लगभग 18 माह के लिये सचिवालय भेजा जाता है। इसके पश्चात् ही उन्हें ज़िलाधीश (District Magistrate) बनाया जाता है।   
·         शुरुआती स्तर पर एक आईएएस अधिकारी को सब डिविज़नल ऑफिसर (SDO), सब डिविज़नल मजिस्ट्रेट (SDM), चीफ़ डेवलेपमेंट ऑफिसर (CDO) जैसे पदों पर नियुक्त किया जाता है। फिर इन्हें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अथवा ज़िलाधिकारी (DM), डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, डिप्टी कमिश्नर (DC) या डिविज़नल कमिश्नर के पद पर नियुक्त किया जाता है।
·         ये सभी वैसे पद हैं जो फील्ड पोस्टिंग के समय आईएएस अधिकारी ग्रहण करते हैं। इसके अतिरिक्त, इनकी नियुक्ति किसी स्वायत्त संगठन, पीएसयू, वर्ल्ड बैंक, एशियाई डेवलपमेंट बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भी की जा सकती है। 
·         ये केन्द्रीय मंत्री के निजी सचिव के रूप में भी कार्य करते हैं। 
पदोन्नति
·         लोक सेवा में पदोन्नति वरिष्ठता और/या योग्यता के आधार पर होती है।
·         समय के साथ प्रदर्शन के आधार पर इनकी प्रोन्नति होती है।
·      प्रोन्नति के बाद ये केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अंतर्गत कई पदों पर कार्य करते हैं। ये क्रमशः निम्नलिखित पदों का दायित्व संभालते हैं-
अवर सचिव
भारत सरकार के अधीन उप-सचिव
• 
भारत सरकार के अधीन निदेशक
• 
भारत सरकार के अधीन संयुक्त सचिव / राज्य सरकार के अधीन सचिव
• 
भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव / राज्य सरकार में मुख्य सचिव
• 
भारत सरकार में सचिव / प्रधान सचिव
• 
कैबिनेट सेक्रेटरी 
·    कैबिनेट सेक्रेटरी बनना हर आईएएस अधिकारी का सपना होता है, लेकिन यह सौभाग्य बहुत ही कम अधिकारियों को अपने सेवा काल के अंतिम वर्षों में मिल पाता है। 
·    आईएएस अधिकारी के रूप में इनकी सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना प्रधानमंत्री तथा विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के प्रधान सचिव के रूप में होती है|
सेवाकालीन प्रशिक्षण :
·      अकादमिक प्रशिक्षण के पश्चात् इन अधिकारियों को जो प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे ये कार्य करते हुए प्राप्त करते हैं। 
·      आईएएस अधिकारियों को सेवा में रहते हुए 6-9 वर्ष, 10-16 वर्ष तथा 17-20 वर्ष की अवधि पर  सेवाकालीन प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण प्रायः अल्पावधिक होता है  
·     इसी प्रकार, राज्य सेवाओं से आईएएस में पदोन्नत होने वाले अधिकारी भी मसूरी में 5 सप्ताह का आगमन प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। 
·      भारतीय लोक प्रशासन संस्थान भी 38 सप्ताह का एम.फिल. स्तरीयएडवांस्ड प्रोफेशन प्रोग्राम इन  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (APPPA) प्रदान करता है। 
कार्य :
·        आईएएस अधिकारी विभिन्न देशों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं| ये सरकार के प्रतिनिधि के रूप में विभिन्न संधियों एवं समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिये अधिकृत (Authorized) होते हैं|
·         जब ये ज़िला स्तर पर कार्य करते हैं तो इन्हें ज़िलाधिकारी, कलेक्टर आदि नामों से जाना जाता है
·     ये ज़िला स्तर के सभी कार्यों के लिये सीधे तौर पर उत्तरदायी होते हैं, चाहे वह विकास कार्य हो या कानून व्यवस्था या फिर आपदा प्रबंधन|
·         इन पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने का उत्तरदायित्व तो होता ही है, साथ ही सामान्य और राजस्व प्रशासन में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। 
·         एक आईएएस अधिकारी पर नीतियों के सफल क्रियान्वयन का दारोमदार तो होता ही है, साथ ही नीति निर्माण में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। 
·         समय के साथ इन्हें अलग-अलग विभागों में भी कार्य करना होता है जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल भिन्न होते हैं।  
·         कार्य प्रकृति की यह विविधता जहाँ चुनौतियों से भरी होती है, वहीं इसमें अलग-अलग अनुभवों से गुज़रने का सुख भी मिलता है।
·         ज़िला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर ज़िले का मुख्य कार्यकारी, प्रशासनिक और राजस्व अधिकारी होता है। वह ज़िले में कार्य कर रही विभिन्न सरकरी एजेंसियों के मध्य आवश्यक समन्वय की स्थापना करता है|
·      ज़िला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर के कार्य एवं दायित्वों को कलेक्टर, ज़िला मजिस्ट्रेट, डिप्टी कमिश्नर, मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी और निर्वाचन अधिकारी के कार्यों और दायित्वों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है|
·         सचिवालयों में ये उप सचिव, अवर सचिव, मुख्य सचिव, प्रधान सचिव इत्यादि के दायित्व निभाते हैं|


Union Public Service Commission (upsc) - WHY to choose UPSC

सिविल सेवा ही क्यों ?

आखिर हम सिविल सेवक के रूप में अपना कॅरियर क्यों चुनना चाहते हैं- क्या सिर्फ देश सेवा के लिये? वो तो अन्य रूपों में भी की जा सकती है। या फिर सिर्फ पैसों के लिये? लेकिन इससे अधिक वेतन तो अन्य नौकरियों एवं व्यवसायों में मिल सकता है।
फिर ऐसी क्या वजह है कि सिविल सेवा हमें इतना आकर्षित करती है? आइये, अब हम आपको सिविल सेवा की कुछ खूबियों से अवगत कराते हैं जो इसे आकर्षण का केंद्र बनाती हैं।
  • यदि हम एक सिविल सेवक बनना चाहते हैं तो स्वाभाविक है कि हम ये भी जानें कि एक सिविल सेवक बनकर हम क्या-क्या कर सकते हैं? इस परीक्षा को पास करके हम किन-किन पदों पर नियुक्त होते हैं? हमारे पास क्या अधिकार होंगे? हमें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा? इसमें हमारी भूमिका क्या और कितनी परिवर्तनशील होगी इत्यादि। 
  • अगर शासन व्यवस्था के स्तर पर देखें तो कार्यपालिका के महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन सिविल सेवकों के माध्यम से ही होता है। वस्तुतः औपनिवेशिक काल से ही सिविल सेवा को इस्पाती ढाँचे के रूप में देखा जाता रहा है। हालाँकि, स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 70 साल पूरे होने को हैं, तथापि इसकी महत्ता ज्यों की त्यों बनी हुई है, लेकिन इसमें कुछ संरचनात्मक बदलाव अवश्य आए हैं।
  • पहले, जहाँ यह नियंत्रक की भूमिका में थी, वहीं अब इसकी भूमिका कल्याणकारी राज्य के अभिकर्ता (Procurator) के रूप में तब्दील हो गई है, जिसके मूल में देश और व्यक्ति का विकास निहित है।
  • आज सिविल सेवकों के पास कार्य करने की व्यापक शक्तियाँ हैं, जिस कारण कई बार उनकी आलोचना भी की जाती है। लेकिन, यदि इस शक्ति का सही से इस्तेमाल किया जाए तो वह देश की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है। यही वजह है कि बड़े बदलाव या कुछ अच्छा कर गुज़रने की चाह रखने वाले युवा इस नौकरी की ओर आकर्षित होते हैं और इस बड़ी भूमिका में खुद को शामिल करने के लिये सिविल सेवा परीक्षा में सम्मिलित होते हैं।
  • यह एकमात्र ऐसी परीक्षा है जिसमें सफल होने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासन के उच्च पदों पर आसीन होने और नीति-निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने का मौका मिलता है।
  • इसमें  केवल आकर्षक वेतन, पद की सुरक्षा, कार्य क्षेत्र का वैविध्य और अन्य तमाम प्रकार की सुविधाएँ ही नहीं मिलती हैं बल्कि देश के प्रशासन में शीर्ष पर पहुँचने के अवसर के साथ-साथ उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा भी मिलती है।
  • हमें आए दिन ऐसे आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के बारे में पढ़ने-सुनने को मिलता है, जिन्होंने अपने ज़िले या किसी अन्य क्षेत्र में कमाल का काम किया हो। इस कमाल के पीछे उनकी व्यक्तिगत मेहनत तो होती ही है, साथ ही इसमें बड़ा योगदान इस सेवा की प्रकृति का भी है जो उन्हें ढेर सारे विकल्प और उन विकल्पों पर सफलतापूर्वक कार्य करने का अवसर प्रदान करती है।
  • नीति-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण ही सिविल सेवक नीतिगत सुधारों को मूर्त रूप प्रदान कर पाते हैं। 
  • ऐसे अनेक सिविल सेवक हैं जिनके कार्य हमारे लिये प्रेरणास्रोत के समान हैं। जैसे- एक आईएएस अधिकारी  एस.आर. शंकरण जीवनभर बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ लड़ते रहे तथा उन्हीं के प्रयासों से “बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम,1976” जैसा कानून बना। इसी तरह बी.डी. शर्मा जैसे आईएएस अधिकारी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ नक्सलवाद की समस्या को सुलझाने का प्रयास किया तथा आदिवासी इलाकों में सफलतापूर्वक कई गतिशील योजनाओं को संचालित कर खासे लोकप्रिय हुए। इसी तरह, अनिल बोर्डिया जैसे आईएएस अधिकारी ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें इस सेवा के अंतर्गत ही अनेक महान कार्य करने के अवसर प्राप्त हुए, जिसके कारण यह सेवा अभ्यर्थियों को काफी आकर्षित करती है।
  • स्थायित्व, सम्मान एवं कार्य करने की व्यापक, अनुकूल एवं मनोचित दशाओं इत्यादि का बेहतर मंच उपलब्ध कराने के कारण ये सेवाएँ अभ्यर्थियों एवं समाज के बीच सदैव प्राथमिकता एवं प्रतिष्ठा की विषयवस्तु रही हैं। 
  • कुल मिलाकर, सिविल सेवा में जाने के बाद हमारे पास आगे बढ़ने और देश को आगे बढ़ाने के अनेक अवसर होते हैं। सबसे बढ़कर हम एक साथ कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रबंधन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विकास में योगदान कर सकते हैं जो किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र में शायद ही सम्भव है।
  • सिविल सेवकों के पास ऐसी अनेक संस्थागत शक्तियाँ होती हैं जिनका उपयोग करके वे किसी भी क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं। यही वजह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में सफल लोग भी इस सेवा के प्रति आकर्षित होते हैं। 
  • सिविल सेवा परीक्षा के अंतर्गत शामिल प्रत्येक सेवा की प्रकृति और चुनौतियाँ भिन्न-भिन्न हैं। इसलिये आगे हम प्रमुख सिविल सेवाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे, जैसे- उनमें कार्य करने का कितना स्कोप है, प्रोन्नति की क्या व्यवस्था है, हम किस पद तक पहुँच सकते हैं आदि, ताकि अपने ‘कॅरियर’ के प्रति हमारी दृष्टि और भी स्पष्ट हो सके।

Union Public Service Commission (upsc) - Exam Structure

सिविल सेवा परीक्षा का प्रारूप- 

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा का प्रारूप इस प्रकार है -  
परीक्षा 
परीक्षा आयोजन का माह  (सामान्यत:)
विषय 
कुल अंक 
*1  प्रारंभिक 
मई 
सामान्य अध्ययन  प्रश्नपत्र  I & II
प्रश्नपत्र  I – 200 
प्रश्नपत्र  II – 200

मुख्य 
सितंबर
सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –I)
सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –II)
सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –III)
सामान्य अध्ययन  (प्रश्नपत्र –IV)
वैकल्पिक विषय (प्रश्नपत्र –I)
वैकल्पिक विषय (प्रश्नपत्र –II)
निबंध लेखन
250
250
250
250
250
250
250


*2 अनिवार्य : अंग्रेज़ी   
*3 अनिवार्य : भारतीय भाषा
300
300
साक्षात्कार 
फरवरी-मार्च-अप्रैल 
व्यक्तित्व परीक्षण 
275

नोट:
  • *1 प्रारंभिक परीक्षा में प्राप्त किये गये अंकों को मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार के अंकों के साथ नहीं जोड़ा जाता है।
  • *2,*3  अनिवार्य अंग्रेज़ी एवं भारतीय भाषा में प्राप्त किये गए अंकों को भी मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार के अंकों (1750+275=2025) के साथ नहीं जोड़ा जाता है। 
  • उम्मीदवार का अंतिम चयन मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार में प्राप्त किये गये अंकों के योग के आधार पर होता है।  

Union Public Service Commission (UPSC) - Introduction

सिविल सेवा परीक्षा : एक परिचय
     संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), जो भारत का एक संवैधानिक निकाय है, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसी अखिल भारतीय सेवाओं तथा भारतीय विदेश सेवा (IFS), भारतीय राजस्व सेवा (IRS), भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) एवं भारतीय कंपनी कानून सेवा (ICLS) आदि जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं हेतु अभ्यर्थियों का चयन करने के लिये प्रत्येक वर्ष सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करता है। प्रत्येक वर्ष लाखों अभ्यर्थी अपना भाग्य आज़माने के लिये इस परीक्षा में बैठते हैं। तथापि, उनमें से चंद अभ्यर्थियों को ही “राष्ट्र के वास्तुकार” (Architect of Nation) की संज्ञा से विभूषित इन प्रतिष्ठित पदों तक पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त होता है। ‘सिविल सेवा परीक्षा’ मुख्यत: तीन चरणों (प्रारंभिक, मुख्य एवं साक्षात्कार) में सम्पन्न की जाती है जिनका सामान्य परिचय इस प्रकार है- 
प्रारंभिक परीक्षा:
  • सिविल सेवा परीक्षा का प्रथम चरण प्रारंभिक परीक्षा कहलाता है। इसकी प्रकृति पूरी तरह वस्तुनिष्ठ (बहुविकल्पीय) होती है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक प्रश्न के लिये दिये गए चार संभावित विकल्पों (a, b, c और d) में से एक सही विकल्प का चयन करना होता है। 
  • प्रश्न से सम्बंधित आपके चयनित विकल्प को आयोग द्वारा दी गई ओएमआर सीट में प्रश्न के सम्मुख दिये गए संबंधित गोले (सर्किल) में उचित स्थान पर काले बॉल पॉइंट पेन से भरना होता है। 
  • सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 200 अंकों की होती है। 
  • वर्तमान में प्रारंभिक परीक्षा में दो प्रश्नपत्र शामिल हैं। पहला प्रश्नपत्र ‘सामान्य अध्ययन’ (100 प्रश्न, 200 अंक) का है, जबकि दूसरे को ‘सिविल सेवा अभिवृत्ति परीक्षा’ (Civil Services Aptitude Test) या ‘सीसैट’ (80 प्रश्न, 200 अंक) का होता है और यह क्वालीफाइंग पेपर के रूप में है। सीसैट प्रश्नपत्र में 33% अंक प्राप्त करने आवश्यक हैं।
  • दोनों प्रश्नपत्रों में ‘निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू है जिसके तहत 3 उत्तर गलत होने पर 1 सही उत्तर के बराबर अंक काट लिये जाते हैं।
  • प्रारंभिक परीक्षा में कट-ऑफ का निर्धारण सिर्फ प्रथम प्रश्नपत्र यानी सामान्य अध्ययन के आधार पर किया जाता है।

मुख्य परीक्षा: 

  • सिविल सेवा परीक्षा का दूसरा चरण ‘मुख्य परीक्षा’ कहलाता है।
  • प्रारंभिक परीक्षा का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि सभी उम्मीदवारों में से कुछ गंभीर व योग्य उम्मीदवारों को चुन लिया जाए तथा वास्तविक परीक्षा उन चुने हुए उम्मीदवारों के बीच आयोजित कराई जाए। 
  • मुख्य परीक्षा कुल 1750 अंकों की है जिसमें 1000 अंक सामान्य अध्ययन के लिये (250-250 अंकों के 4 प्रश्नपत्र)500 अंक एक वैकल्पिक विषय के लिये (250-250 अंकों के 2 प्रश्नपत्र) तथा 250 अंक निबंध के लिये निर्धारित हैं।
  • मुख्य परीक्षा में ‘क्वालिफाइंग’ प्रकृति के दोनों प्रश्नपत्रों (अंग्रेज़ी एवं हिंदी या संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कोई भाषा) के लिये 300-300 अंक निर्धारित हैं, जिनमें न्यूनतम अर्हता अंक 25% (75 अंक) निर्धारित किये गए हैं। इन प्रश्नपत्रों के अंक योग्यता निर्धारण में नहीं जोड़े जाते हैं।   
  • मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में साथ-साथ प्रकाशित किये जाते हैं, हालाँकि उम्मीदवारों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से किसी में भी उत्तर देने की छूट होती है (केवल साहित्य के विषयों में यह छूट है कि उम्मीदवार उसी भाषा की लिपि में उत्तर लिखे है, चाहे उसका माध्यम वह भाषा न हो)।  
  • गौरतलब है कि जहाँ प्रारंभिक परीक्षा पूरी तरह वस्तुनिष्ठ (Objective) होती है, वहीं मुख्य परीक्षा में अलग-अलग शब्द सीमा वाले वर्णनात्मक (Descriptive) या व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) प्रश्न पूछे जाते हैं। इन प्रश्नों में विभिन्न विकल्पों में से उत्तर चुनना नहीं होता बल्कि अपने शब्दों में लिखना होता है। यही कारण है कि मुख्य परीक्षा में सफल होने के लिये अच्छी लेखन शैली बहुत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

साक्षात्कार: 

  • सिविल सेवा परीक्षा का अंतिम एवं महत्त्वपूर्ण चरण साक्षात्कार (Interview) कहलाता है।    
  • मुख्य परीक्षा मे चयनित अभ्यर्थियों को सामान्यत: फरवरी-मार्च-अप्रैल माह में आयोग के समक्ष साक्षात्कार के लिये उपस्थित होना होता है। 
  • इसमें न तो प्रारंभिक परीक्षा की तरह सही उत्तर के लिये विकल्प दिये जाते हैं और न ही मुख्य परीक्षा के कुछ प्रश्नपत्रों की तरह अपनी सुविधा से प्रश्नों के चयन की सुविधा होती है। हर प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य होता है और हर उत्तर पर आपसे प्रतिप्रश्न भी पूछे जा सकते हैं। हर गलत या हल्का उत्तर ‘नैगेटिव मार्किंग’ जैसा नुकसान करता है और इससे भी मुश्किल बात यह कि परीक्षा के पहले दो चरणों के विपरीत इसके लिये कोई निश्चित पाठ्यक्रम भी नहीं है। दुनिया में जो भी प्रश्न सोचा जा सकता है, वह इसके पाठ्यक्रम का हिस्सा है। दरअसल, यह परीक्षा अपनी प्रकृति में ही ऐसी है कि उम्मीदवार का बेचैन होना स्वाभाविक है।  
  • यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में इंटरव्यू के लिये कुल 275 अंक निर्धारित किये गए हैं। मुख्य परीक्षा के अंकों (1750 अंक) की तुलना में इस चरण के लिये निर्धारित अंक कम अवश्य हैं लेकिन अंतिम चयन एवं पद निर्धारण में इन अंकों का विशेष योगदान होता है। 
  • इंटरव्यू के दौरान अभ्यर्थियों के व्यक्तित्व का परीक्षण किया जाता है, जिसमें आयोग में निर्धारित स्थान पर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों द्वारा मौखिक प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनका उत्तर अभ्यर्थी को मौखिक रूप से ही  देना होता है। यह प्रक्रिया अभ्यर्थियों की संख्या के अनुसार सामान्यत: 40-50 दिनों तक चलती है।        
  • मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार में प्राप्त किये गए अंकों के योग के आधार पर अंतिम रूप से मेधा सूची (मेरिट लिस्ट) तैयार की जाती है।   
  • इस चरण के लिये चयनित सभी अभ्यर्थियों का इंटरव्यू समाप्त होने के सामान्यत: एक सप्ताह पश्चात् अन्तिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी की जाती है। 

Zero To One Summary

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Zero To One Summary
Zero To One will teach you the way he thinks, how he approaches business, and what you can do to build your startup’s own future and shape the future of the world in the process.
Here are my 3 lessons from the book:
  1. The biggest leaps in progress are vertical, not horizontal.
  2. Monopolies are good, for both business and society.
  3. Founders need a vision to take their business from zero to one.
Let’s see how the future is made!

Lesson 1: The biggest leaps in progress are vertical, not horizontal.

Can you imagine what the year 2200 will look like? It’s hard, isn’t it? That’s because you know the world is making tremendous progress every year, but it’s almost impossible to know what that will look like.
But not all progress is created equal. Most of the progress we see on a day-to-day basis is horizontal. This kind of progress spreads existing ideas and technologies from one to many or 1 to n. An example would be Apple making the computer personal – with the Apple II it finally became affordable for the masses to own one.
Vertical progress is what it takes to go from zero to one and create the technology or idea in the first place. Apple did this too when they came up with the iPhone in 2007 and changed the way we see and use phones altogether.
If you want to create a startup that’ll not only improve but drastically change the world, you have to go from zero to one, not one to many. You can only do that by critically questioning a lot of the assumptions you hold about the present.
Can people live on the moon? Is a world without cars possible? Will we be able to fully live off renewable energies?
These are the kinds of questions you should concern yourself with if you want to play (and win) big.

Lesson 2: Monopolies aren’t bad. They’re good. For business, and society.

How often have you complained about something not working the way you want it on a Windows computer? Don’t tell me, I’ve been a Microsoft user, I know. With 75% of the market running on Windows, they’re pretty much a monopoly – but is that really a bad thing?
No! Peter Thiel says that a monopoly simply means one company is doing something so much better than everyone else, that simply no one else can survive. This is actually good for everyone.
Think about Google. You love to use Google, because you know it’s the best search engine out there. Google loves setting its own prices and reaping 25% of their revenue as profit, so it can make its service even better.
And society should love it, because if ever someone came along and did beat Google, it would mean their search engine would probably have to be pretty spankin’ fantastic! Monopolies are nothing to scoff at – they’re actually what any business or startup should shoot for.

Lesson 3: If the founders don’t have a vision, a company can never go from zero to one.

But building a monopoly surely doesn’t happen over night. Thiel and a 50 person Paypal team spent years getting it to a place where it was the number one payment processor used by ebay customers, so they could finally leverage their monopoly position into selling the company.
Where did they find the motivation to stick with it? One word: vision.
When you look at founders of successful companies, you’ll find 90% of them are, in a way, weirdos. Steve Jobs is only the most prominent example, but actually plenty of entrepreneurs have a few quirks – and that’s good.
Being a little weird is what lets leaders develop a grand, if slightly delusional, vision for the future, which is exactly what companies need to go from zero to one.
Way back in 1999 Thiel said: “PayPal will give citizens worldwide more direct control over their currencies than they ever had before.” A mouthful? Sure! But he was right. His vision of the future showed an entirely different reality than the one he lived in, and the drive it instilled in himself and his team is exactly what led them to creating the very future they imagined.
So think big. As they say: “Shoot for the moon. Even if you miss it, you’ll be among the stars.”
Zero To One Review
I always wonder what the best approach to success is. Do you start small, build something, then make it a little bigger next time, and iterate year after year, until you have something big? Or do you go straight for the top?
It seems like if you develop the mindset for the latter, you’ll end up playing in an entirely different league right from the start. A radical and eye-opening book, let the summary hook you and the book then convince you. Should you have even the slightest entrepreneurial inclination, then it’s time you learn how to go from Zero To One.

What else can you learn from the blinks?

  • The big mistake CV optimizers make
  • What the strategy is startups can use to actually become a monopoly
  • How focus will make your business profitable, if you’re willing to put in the years
  • Why the people are what matters most in a startup, and which 3 things you should pay the most attention to when assembling your team
  • What can lead your startup to fail, even if you have the most innovative product in the world

Who would I recommend the Zero To One summary to?

The 22 year old with a grand idea, but not much support from friends and family, the 48 year old CTO, with a focus on 1-to-n and anyone who studies economics.