"Love your job, but never fall in love with your company"

I want to take today’s discussion into a current working context with the Narayana Murthy’s quote “Love your job, but never fall in love with your company because you never know when the company stops loving you”. 

The quote talks about different elements of your professional life, goals and value to a company. The big question revolves around commitment to a company or a value which promises to be an interesting context. 

It seems like a strange word in today’s context. There are so many opportunities and challenges out there.

  • The idea of 1 job for your entire life seems to have gone extinct. It appears like a context of the past and doesn’t seem to hold relevance anymore.
  • On that note, what does this job commitment mean? Does it mean that you are willing to give your heart and soul to a company? Or, does it mean that you are in love with the idea of this job?
  • How committed are you to this job? To what extent can you go for this job, the sacrifices you are willing to make?
  • Does it reward you sufficiently for the hard work? Do you have adequate career progression points as you go further.

The moment you start answering these questions, a few more pop in to your head. In all fairness, you need to be thinking about this because no one else will do it for you.

When one of the largest business owners in the country – Narayana Murthy speaks about the difference between loving a job and loving a company, there is sense in giving it some thought.

Loving the job or company?

It does feel a bit strange coming from a person who runs a business empire. A natural inclination for someone like that would be to ensure there is employee loyalty and people falling in love with the company.

  • There is no such thing called a selfless sacrifice – especially for a company
  • A job provides you an opportunity to run your profession. It is great to fall in love with what you do for a living. You spend a good part of your life doing that.
  • For a company, you are an asset, a valuable resource. Apart from that, speaking from a purely business sense, it doesn’t mean anything more. At times, you can also be a liability for a company. That becomes true when you hear about cases of redundancy, outsourcing, hiring freeze, etc.
  • It is a practical world out there. The purpose of a business or a company is to serve its clients. Although it may like to take care of its employees, I am afraid you are on your own when it comes to your life.

The last point is perhaps the most important one. It is your life which is in question. You must have a greater control over it than the company which appoints you.

What matters the most to you?

If you go back to the basic questions

  • Why are you doing this job?
  • What do you like or not like about it?
  • Are there any other companies or organisations which can offer you similar or better opportunities?
  • What is the personal difference this company makes to you? Do you have alternatives to achieve the same goal?

If you look at these questions, the focus is inward. We are trying to question whether this job provides you the fulfilment you deserve and desire. There are a thousand companies out there and you can make real difference to them.

The reasons for staying with a company is not just because you love the idea of a brand. It must be because it makes sense to you. Ultimately, it is only you who you are trying to satisfy – no one else.

You conclusion?

With the above in mind, what do you think about this quote?

  • Do you want to stay with a company just because you like it? Or does it meet your goals?
  • The company is not doing you any favour. You are providing a service and being paid for it. Although loyalty is a good thing, there is a better gain in loyalty to yourself.
  • Who would you rather fall in love with? There are multiple avenues to do a similar job. A company is just a company in the end. It is YOU who needs to be satisfied.

On that note, I open this topic for discussion and would love to know what you think about this quote from Narayana Murthy.

COVID-19 के कारण रक्त के थक्के जमने की समस्याएँ

हाल ही में विश्व भर में कई चिकित्सकों ने COVID-19 से संक्रमित मरीज़ों में रक्त के थक्के जमने से जुड़ी समस्याओं के मामलों में वृद्धि देखी है, चिकित्सकों के अनुसार, यदि ऐसे मामलों में मरीज़ को जल्दी उपचार नहीं उपलब्ध कराया जाता तो यह जानलेवा भी हो सकता है।

  • इस बीमारी में अलग-अलग मरीज़ों में पैरों पर मामूली त्वचा घाव, जिसे ‘कोविड टो ‘ (COVID Toe) भी कहा जाता है, से लेकर दिल के दौरे पड़ने और नसों में रक्त के थक्के जमने जैसे घातक मामले भी देखे गए हैं।
  • ऐसे मामलों में सही समय पर इलाज न होने से श्वसन से जुड़ी समस्याओं के ठीक होने के कई दिनों या महीनों बाद मरीज़ में इस बीमारी के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। 

संक्रमणों में रक्त जमने के मामले: 

  • विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे संक्रमण के मामलों में थक्के जमाने के खतरों का बढ़ना असामान्य नहीं है। 
  • इससे पहले वर्ष 1918 की स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu) की महामारी के दौरान भी मरीज़ो में रक्त के थक्के जमने के मामले देखे गए थे, जिनसे बहुत ही जल्दी व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती थी। 
  • इसके अतिरिक्त अन्य वायरस जैसे-एचआईवी (HIV), डेंगू (Dengue), इबोला (Ebola) आदि भी रक्त जमने जैसे हानिकारक प्रभावों के लिये जाने जाते हैं।
  • हालाँकि COVID-19 में थक्के जमने की तीव्रता अन्य संक्रमणों की तुलना में कई गुना अधिक है।
  • चिकित्सकों के अनुसार, कुछ मामलों में ऐसे रक्त के थक्के, मरीजों में गुर्दे को सहायता देने वाले ‘आर्टीरियल कैथीटर्स’ (Arterial Catheters) और फिल्टर्स (Filters) में बनते हैं, जिन्हें थ्रोम्बी (Thrombi) कहा जाता है। परंतु अधिक खतरनाक वे थक्के हैं जो फेफड़े में रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं, जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है।

प्रभाव:    

  • चिकित्सकों के अनुमान के अनुसार, रक्त के इन थक्कों का जमना मरीज़ों के स्वास्थ्य में तीव्र गिरावट और ब्लड-ऑक्सीजन की कमी का प्रमुख कारण हो सकता है।   
  • फरवरी 2020 में चीन में मरीज़ों में रक्त के थक्के जमने के मामले देखे गए थे परंतु इनकी गंभीरता के बारे में स्थिति अब और अधिक स्पष्ट हो गई है।  
  • इसके अतिरिक्त फ्राँस और नीदरलैंड में किये गए अध्ययनों में देखा गया कि COVID-19 से संक्रमित लगभग 30% मरीज़, ‘पाॅल्मनरी इंबाॅलिज़्म’ (Pulmonary Embolism) नामक बीमारी से ग्रस्त थे, जिसमें फेफड़े की धमनियों में रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है।
  • यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया जाता तो धमनियों में बड़े थक्कों से हृदय पर दबाव बढ़ सकता है और व्यक्ति को हृदय आघात भी हो सकता है।
  • 3 में से एक मामले में सही समय पर इलाज न मिले पर इसके घातक परिणाम हो सकते हैं और 6 में से 1 व्यक्ति में इसके लक्षण पुनः वापस आ सकते हैं।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, इस महामारी के बाद प्रभावित फेफड़े और रक्त के थक्के जमने से जुड़े मामलों में वृद्धि हो सकती है।
  • शरीर के अन्य हिस्सों में रक्त के थक्के जमने से अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों जैसे-दिल, गुर्दे, यकृत, आंत और अन्य ऊतकों आदि को क्षति हो सकती है।
  • मरीज़ो में रक्त के थक्कों के जमने की स्थिति में इसके परीक्षण के लिये डी-डाईमर ब्लड टेस्ट (D-Dimer Blood Test) का प्रयोग किया जाता है।  

आगे की राह:

  • विशेषज्ञों के अनुसार, जहाँ एक तरफ COVID-19 से संक्रमित मरीज़ों में ऐसी समस्याओं का पता चलना इस बीमारी को और अधिक जटिल बनता है, परंतु साथ ही अधिक-से-अधिक जानकारी के पता होने से इस बीमारी का बेहतर तरीके से उपचार करना संभव हो सकेगा। 
    • उदाहरण के लिये: इटली में  ‘पाॅल्मनरी इंबाॅलिज़्म’ से एक मरीज़ की मृत्यु होने के बाद चिकित्सकों का ध्यान इस तरफ गया और इसके बाद कई अन्य मरीज़ो में इसके उपचार के प्रयास किये गए।   
  • COVID-19 के बारे में जैसे-जैसे अधिक जानकारी प्राप्त होगी चिकित्सकों को इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को उनके लक्षणों के आधार पर बेहतर और लक्षित उपचार उपलब्ध कराने में आसानी होगी।
  • शीर्ष स्वास्थ्य संस्थाओं को COVID-19 के संबंध में दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत चिकित्सकों और ज़मीनी स्तर पर कार्यरत सहयोगियों को अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करनी चाहिये, जिससे शीघ्र ही इस बीमारी के लक्षणों की पहचान कर मरीज़ों को उचित सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

"ATULYA-Microwave Steriliser"

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation- DRDO) के तहत पुणे स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस टेक्नोलॉजी (Defence Institute of Advanced Technology) ने कोरोनावायरस (COVID-19) को विघटित अथवा समाप्त करने के लिये ‘अतुल्य’ (ATULYA) नाम से एक ‘माइक्रोवेव-स्ट्रेलाइज़र’ (Microwave Steriliser) तैयार किया है।

  • रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह वायरस 56 डिग्री से 60 डिग्री सेल्सियस तापमान में विभेदकारी ऊष्माष्यन (Differential Heating) द्वारा विघटित हो जाता है।
  • यह उत्पाद एक किफायती उपाय है जिसे पोर्टेबल (Portable) या फिक्स्ड इंस्टोलेशन (Fixed Installations) किसी भी रूप में संचालित (Operate) किया जा सकता है।
  • मानव सुरक्षा की दृष्टि से इस उपकरण का परीक्षण किया गया है और इसे सुरक्षित पाया गया है। 
  • मंत्रालय के अनुसार, भिन्न-भिन्न वस्तुओं के आकार और ढाँचे के अनुरूप विघटन का समय 30 सेकेंड से एक मिनट तक रहता है। इस उपकरण का वजन लगभग तीन किलोग्राम है और इसका उपयोग केवल गैर-मेटैलिक (Non-Metallic) वस्तुओं के लिये किया जा सकता है।

Atulya

DRDO और कोरोनावायरस

  • देश में कोरोनावायरस का प्रसार काफी तेज़ी से हो रहा है और संक्रमण का आँकड़ा दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, देश भर में कोरोनावायरस संक्रमण के कुल 52000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और इस वायरस के प्रभाव से तकरीबन 1700 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 
  • हालाँकि इस वायरस का मुकाबला करने के लिये देश का प्रत्येक व्यक्ति और संस्थान अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहा है।
  • इसी क्रम में सशस्त्र बल और DRDO समेत रक्षा मंत्रालय के विभिन्न विंग्स भी देश में महामारी के प्रसार को रोकने का काफी प्रयास कर रहे हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार, विभिन्न प्रकार के उत्पादों को डिज़ाइन और विकसित कर रहे हैं।
    • DRDO की स्थापना वर्ष 1958 में रक्षा विज्ञान संगठन (Defence Science Organisation-DSO) के साथ भारतीय सेना के तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (Technical Development Establishment-TDEs) और तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (Directorate of Technical Development & Production- DTDP) के संयोजन के माध्यम से की गई थी।
    • DRDO रक्षा मंत्रालय के रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के तहत कार्य करता है।
  • DRDO ने महामारी से निपटने के लिये कई उत्पाद विकसित किये हैं, जिनमें वेंटिलेटर, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (Personal Protective Equipment-PPE) किट, बड़े क्षेत्रों को सैनिटाइज़ करने हेतु उपाय और COVID-19 परीक्षण के नमूने एकत्रित करने हेतु कियोस्क आदि शामिल हैं।
  • हाल ही में DRDO ने अधिक संक्रमण वाले क्षेत्रों के त्वरित एवं रसायन मुक्त कीटाणुशोधन (Disinfection) के लिये एक अल्ट्रा वॉयलेट डिसइंफेक्सन टॉवर (Ultra Violet Disinfection Tower) भी विकसित किया है।
    • ‘यूवी ब्लास्टर’ (UV blaster) नाम का यह उपकरण एक अल्ट्रा वॉयलेट (UV) आधारित क्षेत्र सैनिटाइज़र (Sanitizer) है।

Indian Foreign Services (IFS)


भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) - 
भारतीय विदेश मंत्रालय के कार्यों के संचालन के लिये एक विशेष सेवा वर्ग का निर्माण किया गया है जिसे भारतीय विदेश सेवा  (Indian Foreign Service- IFS) कहते हैं। यह भारत के पेशेवर राजनयिकों का एक निकाय है। यह सेवा भारत सरकार की केंद्रीय सेवाओं का हिस्सा है। भारत के विदेश सचिव, भारतीय विदेश सेवा के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। यह सेवा अब संभ्रान्त परिवारों, राजा-रजवाड़ों, सैनिक अफसरों आदि तक ही सीमित रहकर सभी के लिये खुल गई है। सामान्य नागरिक भी अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर इस सेवा का हिस्सा बन सकता है।

चयन प्रक्रिया:
·         भारतीय विदेश सेवा में चयन प्रत्येक वर्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजितसिविल सेवा परीक्षाके द्वारा होता है।
·         सिविल सेवा परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों को उनके द्वारा प्राप्त कुल अंकों और उनके द्वारा दी गई सेवा वरीयता के अनुसार ही पदों का आवंटन किया जाता है।
·         इस सेवा के साथ अनेक चुनौतियाँ और उत्तरदायित्व जुड़े हुए हैं, इसलिये संघ लोक सेवा आयोग इस सेवा के लिये ऐसे अभ्यर्थियों  का ही चुनाव करता है जो इस सेवा के अनुकूल हों।
·         हाल के वर्षों में भारतीय विदेश सेवा में प्रति वर्ष लगभग 20 व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है। सेवा की वर्तमान कैडर संख्या लगभग 600 अधिकारियों की है,जिनमें लगभग 162 अधिकारी विदेशों में भारतीय मिशन एवं देश में विदेशी मामलों के मंत्रालय में विभिन्न पदों पर आसीन हैं।
शैक्षिक योग्यता:
·         उम्मीदवार को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ संस्थान से स्नातक (Graduate) होना अनिवार्य है|
प्रशिक्षण:
·         भारतीय विदेश सेवा के लिये चयनित नए सदस्यों को तीन वर्षीय (36 महीनों की अवधिमहत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम से होकर गुज़रना पड़ता है। यह प्रशिक्षण निम्नलिखित चरणों में संपन्न होता है-
1.
आधारभूत प्रशिक्षण - 4 माह (राष्ट्रीय अकादमी, मसूरी में)
2.
व्यावसायिक प्रशिक्षण - 12 माह (ज़िला कार्यालय और अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल, नई दिल्ली में)
3.
व्यावहारिक प्रशिक्षण - 6 माह (विदेश मन्त्रालय के अंतर्गत)
4.
परिवीक्षा प्रशिक्षण - 14 माह (विदेश स्थित उच्चायुक्त/दूतावास में)
·         सर्वप्रथम इन प्रशिक्षु अधिकारियों को ‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी’ में 4 माह का आधारभूत प्रशिक्षण दिया जाता है, जहाँ कई अन्य विशिष्ट भारतीय सिविल सेवा संगठनों के सदस्यों को भी प्रशिक्षित किया जाता है।
·         नए सदस्य एक परिवीक्षा अवधि से गुज़रते हैं, इस दौरान इन्हें परिवीक्षार्थी (प्रोबेशनर) कहा जाता है।
·         लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद परिवीक्षार्थी आगे के प्रशिक्षण के साथ-साथ विभिन्न सरकारी निकायों के साथ संलग्न होने और भारत एवं विदेश में भ्रमण के लिये नई दिल्ली स्थितविदेश सेवा संस्थानमें दाखिला लेते हैं। 
·         इन प्रशिक्षु अधिकारियों को ‘इंडियन स्कूल ऑफ इण्टरनेशनल स्टडीज़, नई दिल्ली’ में 4 माह का विदेश नीति तथा कार्य-प्रणाली, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध तथा भाषा की जानकारी का प्रशिक्षण दिया जाता है।
·         इसके पश्चात् प्रशिक्षु अधिकारियों को 6 माह के लिये किसी ज़िला प्रशासन से संलग्न किया जाता है ताकि ये दायित्व के व्यावहारिक सम्पर्क में आने के योग्य हो जाएँ। साथ ही, इन्हें कुछ समय के लिये विदेश मन्त्रालय के सचिवालय में भी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता हैं।
·         आईएफएस के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाषाओं (हिन्दी तथा एक विदेशी भाषा) और ऐसे विषयों के अध्ययन पर बल दिया जाता है जिनका ज्ञान प्राप्त करना एक आईएफएस अधिकारी के लिये आवश्यक समझा जाता है। 
·         नए सदस्यों को कुछ दिनों के लिये सेना की यूनिट में तथाभारत दर्शनके लिये भी भेजा जाता है।
·         प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर अधिकारी को अनिवार्य रूप से एक विदेशी भाषा (Context Free Language - CFL) सीखने का जिम्मा दिया जाता है। 
·         एक संक्षिप्त अवधि तक विदेश मंत्रालय के साथ संलग्न रहने के बाद अधिकारी को विदेश में एक भारतीय राजनयिक मिशन पर नियुक्त किया जाता है जहाँ की स्थानीय भाषासीएफएलहो। वहाँ  अधिकारी भाषा का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और फिर इनसे सीएफएल में दक्षता प्राप्त करने और एक परीक्षा उत्तीर्ण करने की अपेक्षा की जाती है, उसके बाद ही इन्हें सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाती है।
नियुक्ति एवं पदोन्नति: 
o    आईएफएस अधिकरियों की नियुक्ति सामान्यत: दूतावास, वाणिज्य दूतावास एवं विदेश मंत्रालय में की जाती है।
o    ये विदेशों में अपनी सेवा तृतीय सचिव के तौर पर आरंभ करते हैं और सेवा में स्थायी होते ही द्वितीय सचिव के पद पर प्रोन्नत कर दिये जाते हैं। 
o    आईएफएस अधिकारी की सर्वश्रेष्ठ पदस्थापना राजदूत या विदेश सचिव के रूप में होती है|  इनका पदक्रम इस प्रकार है-
o    दूतावास में:
तृतीय सचिव (प्रवेश स्तर)
द्वितीय सचिव (सेवा में पुष्टि के बाद पदोन्नति)
प्रथम सचिव
सलाहकार
मिशन के उपाध्यक्ष/ उप उच्चायुक्त/ उप स्थायी प्रतिनिधि
राजदूत/उच्चायुक्त/स्थायी प्रतिनिधि
o    वाणिज्य दूतावास में: 
उप वाणिज्य दूत(Vice Consul)
वाणिज्य दूत(Consul)
महावाणिज्य दूत(Consul-General)
o    विदेश मंत्रालय में:
अवर सचिव(Upper Secretary)
उप सचिव(Deputy Secretary)
निदेशक(Director)
संयुक्त सचिव(Joint Secretary)
अतिरिक्त सचिव(Additional Secretary)
सचिव(Secretary)
कार्य
·         वृत्तिक (Professional) राजनयिक के तौर पर आईएफएस अधिकारी से यह आशा की जाती है कि वह विभिन्न मुद्दों पर देश और विदेश दोनों में भारत के हितों का ध्यान रखेगा और इसे आगे बढ़ाएगा। इनमें द्विपक्षीय राजनीतिक और आर्थिक सहयोग, व्यापार और निवेश संवर्द्धन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, प्रेस और मीडिया संपर्क तथा सभी बहुपक्षीय मुद्दे शामिल हैं। 
·         आईएफएस अधिकारी मुख्यत: देश के बाह्य मामलों जैसे- कूटनीति, व्यापार, सांस्कृतिक संबंधों, प्रवास संबंधित मामलों आदि से संबंधित कार्यों को संपादित करते हैं|
·         ये भारत की विदेश नीति के निर्माण तथा क्रियान्वयन में संलग्न रहते हैं|
·         ये अपने दूतावासों, उच्चायोगों और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठनों के स्थायी मिशनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं|
·         नियुक्त किये जाने वाले देश में भारत के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इनका मुख्य उद्देश्य होता है।
·         अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के व्यक्तियों सहित मेज़बान राष्ट्र और उसकी जनता के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने में इनकी मुख्य भूमिका होती है।
·         ये विदेश में उन घटनाक्रमों की सही-सही जानकारी देते हैं, जो भारत के नीति-निर्माण को प्रभावित कर सकती हैं।
·         मेज़बान राष्ट्र के प्राधिकारियों के साथ विभिन्न मुद्दों पर समझौता-वार्ता करने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं की होती है।
·         विदेश मंत्रालय, भारत के विदेश संबंधों से जुड़े सभी पहलुओं के लिये उत्तरदायी है। क्षेत्रीय प्रभाग, द्विपक्षीय राजनीतिक और आर्थिक कार्य देखते हैं, जबकि क्रियात्मक प्रभाग,  नीति-नियोजन, बहुपक्षीय संगठनों, क्षेत्रीय दलों, विधिक मामलों, निःशस्त्रीकरण, नवाचार, भारतीय डायस्पोरा, प्रेस और प्रचार, प्रशासन तथा अन्य कार्यों को देखते हैं।