भारत-चीन के बीच लद्दाख में चल रही रस्साकसी पर विशेष


अब तक मीडिया के माध्यम से ये तो आपको ज्ञात हो चुका होगा कि चीन और भारत के बीच LAC पर तनातनी चल रही है. इस तनातनी के पीछे सिर्फ बदलता ग्लोबल परिदृश्य ही नहीं है...बल्कि भारत का अपने आप को सबल बनाना भी है.

1997 में सरकार ने 4,643 किलोमीटर की कुल लंबाई के साथ 73 रणनीतिक सड़कों की पहचान की थी, जिन्हें भारत चीन बॉर्डर रोड (ICBR) लेबल किया गया था. LAC के साथ-साथ सैनिकों की आवाजाही में सुधार करने और चीन के बुनियादी ढांचे के निर्माण से मेल खाने के लिए ये खाका तैयार किया गया था.

सन 1999 में BRO को इन 73 में से 61  सड़कें बनाने का कार्य मिला और इन सड़कों को 2012 तक बनाना तय हुआ. ये कार्य सीधे PMO की निगरानी में किया जा रहा थापर बदकिस्मती से 2012 तक इन 61 में से सिर्फ 15 सड़कों का ही कार्य पूरा हो पाया.

चीन इस बीच अपनी स्थिति मजबूत करता जा रहा था..और हमारी सरकारें बहुत सुस्त रफ़्तार से इस कार्य को चलने दे रहीं थी. ऐसे में चीन भी खुश था और हमारे नेताओं पर भी काम करने का और देश को सुदृढ़ बनाने का प्रेशर कम ही था.

यही वो समय था जब देश में Corruption चरम पर था और देश के स्ट्रेटजिक कार्य बैकसीट ले चुके थे.

बहरहाल 2015 में सड़क निर्माण में पहले की अपेक्षा तेजी आनी शुरू हुई..और 2016 से 2018 के बीच सड़क निर्माण दुगनी तेजी से आगे बढ़ने लगा.

2017 में डोकलाम में चीन के साथ हुए आमने सामने ने इस कार्य में और कैटेलिस्ट का काम किया..और जहां चीन ने उम्मीद की थी कि इस तरह के कन्फ्रन्टेशन से भारत डर जाएगा..उसके उलट भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर की अपनी तैयारी और तेज कर दी.

डोकलाम की घटना के बाद मोदी सरकार ने एक बहुत बड़ा फैसला ये किया कि LAC के १०० किलोमीटर अंदर डिफेंस infra निर्माण के लिए लगने वाले फॉरेस्ट और पर्यावरण की NOC वाला क्लॉज केंसिल कर दिया.

इन 61 सड़कों की कुल लम्बाई 3323.57 किमी में से 2304.65 किमी पर काम पूरा हो चुका है. बाकी की सड़कों पर काम तेजी से जारी है.  

इस समय श्योक और गलवान नदी पर निर्माण कार्य किया जा रहा है और चीन ने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की तरफ निर्माण करने पर आपत्ति जताई है.  चीन का कहना है कि भारत निर्माण के लिए चीन की सीमा का इस्तेमाल कर रहा है जबकि भारत का कहना है कि वह अपनी सीमा में रहकर ही निर्माण कार्य कर रहा है

भारत द्वारा स्ट्रेटजिक सड़कों के निर्माण की डेडलाइन 2022 रखी गयी है...और जिस रफ़्तार से कार्य चल रहा है चीन भी जानता है कि डेडलाइन के अंदर ही ये कार्य पूरा हो जाएगा.

बस यहीं चीन को लग रहा है कि इकोनॉमिक फ्रंट पे जैसे ही विश्व उसे घेरे और भारत एक बड़ी ताकत बन के उभरे..भारत को कैसे भी दबा के वर्ल्ड में अपनी ताकत दिखाई जाए.

चीन की कैलकुलेशन में शायद 1962 से 2014 वाला भारत है. जल्द ही चीन की ये गलतफहमी भी दूर हो जायेगी.

 


माफ करना विष्णुदत्त विश्नोईजी! हम पर्दे का सिंघम ही डिजर्व करते हैं..


विष्णुदत्त जैसा दबंग और दिलेर अधिकारी किस डर से टूटा होगा? वो डर इतना भयावह है कि राजगढ़ थाने में तैनात पुलिसकर्मियों ने सामूहिक तबादला माँग लिया।  


“उन्होंने क़ानूनी रूप से आमजनों को न्याय दिलाने, सभी वर्गों के बीच सौहार्द कायम करने, और अपराधियों, सट्टेबाजों और नशाखोरों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई को हमेशा से अपनी प्रथम प्राथमिकता माना। उन्होंने लोगों के मन में क़ानून के प्रति विश्वास उत्पन्न किया। उन्होंने विकास कार्यों में जन भागीदारी सुनिश्चित की। बीकानेर के जिन भी क्षेत्रों में वो पदस्थापित रहे, वहाँ उन्होंने अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुँचाने के लिए अपनी जान लगा दी।”

मैं बुजदिल नहीं था…

विश्नोई शनिवार (23 मई 2020) को अपने सरकारी क्वार्टर से फंदे से लटके मिले थे। पंचतत्व में विलीन हो चुके विश्नोई ने दो सुसाइड नोट भी छोड़े थे। एक में उन्होंने जिले की एसपी तेजस्विनी गौतम को लिखा है,

“आदरणीय मैडम। माफ करना। प्लीज, मेरे चारों तरफ इतना प्रेशर बना दिया गया कि मैं तनाव नहीं झेल पाया। मैंने अंतिम साँस तक मेरा सर्वोत्तम देने का राजस्थान पुलिस को प्रयास किया। निवेदन है कि किसी को परेशान नहीं किया जाए। मैं बुजदिल नहीं था। बस तनाव नहीं झेल पाया। मेरा गुनहगार मैं स्वयं हूँ।”

 
वह कैसा दबाव होगा जिसका तनाव विश्नोई जैसा अधिकारी झेल नहीं पाया? वह अधिकारी जिससे दुर्दांत अपराधी ही नहीं डरते थे, बल्कि वह जहाँ रहा उस थाने की सूरत बदल गई। इसके लिए वह सरकार के भरोसे नहीं बैठते थे। जनसहयोग से उन्होंने राजस्थान के कम से कम 19 थानों की सूरत बदली थी। यही वह कमाई थी, जिसके कारण अपराध से त्रस्त पब्लिक विश्नोई की पोस्टिंग अपने इलाके में माँगती थी। उनका तबादला हो जाता तो सड़क पर उतर जाती थी।

किस डर से टूटा होगा?

ऐसा दबंग और दिलेर अधिकारी किस डर से टूटा होगा? वो डर इतना भयावह है कि विश्नोई की आत्महत्या के बाद राजगढ़ थाने में तैनात पुलिसकर्मियों ने सामूहिक तबादला माँग लिया। इस डर की परतें तो निष्पक्ष जाँच से ही खुलेंगी। फिलहाल राजनीतिक दबाव में प्रदेश सरकार न्यायिक जाँच के लिए तैयार हो गई है।

इस मामले में सवालों के घेरे में सादुलपुर की ​कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया हैं। बीकानेर के आईजी को सामूहिक तबादले के लिए जो पत्र लिखा गया है कि उसमें भी पूनिया और उनके समर्थकों पर स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया है कि वे झूठी शिकायतें उच्चाधिकारियों से करते थे। थाने में तैनात कुछ लोगों को इन्होंने दबाव डालकर लाइन हाजिर भी करवा दिया था।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि विश्नोई की सुसाइड का राज थाने की राेजनामचा रपट में दर्ज है। इसके अनुसार “करीब डेढ़ माह पहले एक रपट में उन्होंने लिखा कि शराब का अवैध काराेबार करने वाले बदमाशाें काे पकड़ा ताे छुड़वाने के लिए विधायक ने फाेन पर सिफारिश की। सुसाइड से एक दिन पहले हत्या मामले में हुई बातचीत भी रपट में है।”

हालाँकि पुनिया इसके लिए बीजेपी की ओछी राजनीति को कसूरवार ठहराती हैं। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “मेरी संवेदनाएँ विष्णुदत्त विश्नोई जी के परिवार के साथ है। जिस तरह BJP के नेताओं द्वारा ओछी राजनीति की गई, मैं चाहती हूँ विष्णु दत्त जी की पिछले दिनों की सारी कॉल डिटेल निकलवाकर इस मामले की सम्पूर्ण जाँच की जाए।”
साभार: दैनिक भास्कर

दैनिक भास्कर ने पूनिया से इस मामले में उनका नाम आने को लेकर सवाल किए हैं। जवाब में पूनिया ने कहा है, “विश्नोई से 9 बार फोन पर बात हुई है। कुछ बातचीत 20 से 30 सेकेंड की रही है। बैठकों में आते थे तो देखा है।” साथ ही यह भी कहा है कि दो महीने से लॉकडाउन चल रहा है इस वजह से उनसे कोई खास बात नहीं हुई थी।

सोशल मीडिया में वायरल होती एक तस्वीर जिसमें विश्नोई और पूनिया नजर आ रहे हैं

क्या झूठ बोल रही हैं कृष्णा पूनिया?

जब भास्कर ने नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ से पूछा कि पूनिया का दावा है कि वे कभी बिश्नोई से मिली ही नहीं, तो उन्होंने कहा कहा कि पूनिया झूठ बोल रही हैं। विष्णुदत्त के पास पूनिया और उनके पति के बैठे होने की तस्वीर भी है। राठौड़ का दावा है कि पूनिया उन्हें हटाने के लिए तीन महीने से दबाव बना रहीं थीं। अपने ओएसडी अमित ढाका के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय में झूठी शिकायतें कर रही थीं। उन्होंने आत्महत्या के एक दिन पहले विश्नोई और उनके मित्र गोवर्धन सिंह वकील के बीच ह्वाटसऐप चैट का भी हवाला दिया है। राजस्थान पत्रिका ने राठौड़ के हवाले से कहा है कि 12 घंटे तक विश्नोई के मृत शरीर को फंदे से लटका हुआ रखा गया। शुरुआत में कहा गया कि तीन पन्ने का सुसाइड नोट है। बाद में दो ही पन्ने थे।

सवाल कई, फर्क कई

सवाल कई और भी हैं, जिनके जवाब तलाशे जाने जरूरी हैं। ऐसा इसलिए कि पूनिया कोई परंपरागत नेता नहीं हैं। वह एथलीट रही हैं। कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में पदक जीत देश का नाम रोशन किया है। वह खुद भी कहती हैं कि जिन नेताओं की वजह से इस मामले में मेरा नाम आया है उनकी और मेरी हिस्ट्री में फर्क है।

फर्क केवल पूनिया और दूसरे नेताओं के अतीत में ही नहीं है। फर्क इस मामले को लेकर कॉन्ग्रेस विधायकों के नजरिए में भी है। यही कारण है कि हरियाणा के आदमपुर से कॉन्ग्रेस विधायक कुलदीप बिश्नोई ने 23 मई को ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस मामले में पत्र लिखा था। इसमें कहा था कि विष्णुदत्त विश्नोई जैसा अधिकारी सुसाइड नहीं कर सकता। इस मामले की सीबीआई जॉंच कर हत्या प्रकरण का सरकार खुलासा करे।

फर्क मेनस्ट्रीम मीडिया और लिबरल गिरोह की सोच का भी है। यदि ऐसी घटना किसी बीजेपी शासित राज्य में हुई होती तो आज मोमबत्ती कम पड़ गए होते। यदि आज राजस्थान में बीजेपी की सरकार होती तो विश्नोई की आत्महत्या प्राइम टाइम में होती। सब मिलकर सिस्टम का मर्सिया पढ़ रहे होते।

क्या ईमानदार अधिकारियों की जान की कीमत यह देखकर तय की जाएगी कि सत्ता में कौन है? फिर आप पर्दे का सिंघम ही डिजर्व करते हैं। आपका सिस्टम विष्णुदत्त विश्नोई जैसों के लायक नहीं है।


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भगत सिंह का ‘कम चर्चा’ वाला वो लेख

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और वीर सावरकर ने कई अवसरों पर एक-दूसरे के कार्यों का उल्लेख किया है और उपनिवेशवादी ताकतों के अत्याचार के खिलाफ एक-दूसरे को बाहर निकालने तथा एक-दूसरे की लड़ाई का समर्थन करने के बारे में भी लिखा है। उनके अपने कार्य इस बात के प्रमाण हैं।

“विश्व-प्रेमी वह नायक है, जिसे हम एक उग्र विद्रोही, कट्टर अराजकतावादी- वीर सावरकर कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विश्व-प्रेम की लहर में आकर, वह यह सोचकर घास पर चलना बंद कर देता है कि नरम घास पैरों के नीचे मसल दिया जाता है।”

सावरकर के बारे में उपरोक्त उद्धरण शहीद सरदार भगत सिंह का है। भगत सिंह का ‘विश्व प्रेम’ शीर्षक लेख 15 और 22 नवंबर, 1926 को “मतवाला” के अंक में दो बार प्रकाशित हो चुका है। यह उद्धरण उसी लेख का एक अंश है। “हमारा अंतिम लक्ष्य सार्वभौमिक भाईचारा है। राष्ट्रवाद केवल वहाँ पहुँचने के लिए एक कदम है।” सावरकर ने कई बार कहा है। इस लेख में कहा गया है कि यह न केवल भगत को पता था, बल्कि स्वीकार्य भी था। सावरकर के आंतरिक रूप से कठोर लेकिन बेहद कोमल हृदय का ऐसा वर्णन शायद ही कहीं और देखा हो।

खास बात यह है कि सावरकर उन दिनों राजनीति में भाग नहीं लेने की शर्त पर रत्नागिरी में नजरबंंद थे। भगत सिंह ने इस शर्त को स्वीकार करने के सावरकर के फैसले पर आलोचना का एक शब्द भी नहीं लिखा है। हम कह सकते हैं कि इन दोनों क्रांतिकारियों ने एक-दूसरे के दिल और दिमाग को अच्छी तरह से समझा।

फिर मार्च 1926 में कीर्ति में मदनलाल ढींगरा और सावरकर के बारे में लिखते हुए भगत सिंह कहते हैं, “स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव इंग्लैंड तक भी पहुँच गया और सावरकर ने ‘इंडियन हाउस’ नाम से एक घर खोला। मदनलाल भी इसके सदस्य बन गए। एक दिन सावरकर और मदनलाल ढींगरा लंबे समय से बात कर रहे थे। अपने प्राण त्यागने की हिम्मत की परीक्षा में, सावरकर ने मदनलाल को ज़मीन पर हाथ रखने के लिए कहकर एक बड़ी सुई से हाथ को छेद दिया, लेकिन पंजाबी वीर ने आह भी नहीं भरा। दोनों की आँखों में आँसू भर आए। दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया। वह कितना सुंदर समय था। कितना अमूल्य और अमिट अश्रु था। इतना शानदार। हमें उस भावना के बारे में पता होना चाहिए कि कायर लोग जो मृत्यु के विचार से ही डर जाते हैं। लेकिन दूसरे वे लोग कितने ऊँचे, कितने पवित्र और कितने पूज्य हैं, जो राष्ट्र की खातिर मरते हैं।”

अगले दिन से, ढींगरा भारतीय सदन भवन में नहीं गए और कर्जन विली द्वारा आयोजित भारतीय छात्रों की बैठक में भाग लिया। यह देखकर भारतीय लड़के बहुत उत्तेजित हो गए और उन्हें देशद्रोही, यहाँ तक कि गद्दार कहना शुरू कर दिया, लेकिन सावरकर ने उनका गुस्सा यह कहते हुए शांत कर दिया कि आखिरकार उन्होंने हमारे घर को चलाने के लिए अपना सिर भी तोड़ने की कोशिश की थी और उसकी मेहनत के कारण हमारा आंदोलन चल रहा है। इसलिए हमें उसका धन्यवाद करना चाहिए। खैर, कुछ दिन चुपचाप बीत गए।

1 जुलाई, 1909 को इंपीरियल इंस्टीट्यूट के जहाँगीर हॉल में एक बैठक हुई।  कर्जन वायली भी वहाँ गया। वह दो अन्य लोगों से बात कर रहा था कि ढींगरा ने अचानक पिस्तौल निकाली। उसे हमेशा के लिए सुलाने के लिए तान दिया। फिर कुछ संघर्ष के बाद ढींगरा को पकड़ा गया। उसके बाद क्या कहना, दुनिया भर में रोष था। सभी ने ढींगरा को पूरे दिल से गाली देना शुरू कर दिया।

उनके पिता ने पंजाब से एक तार भेजा और कहा कि मैं अपने बेटे को इस तरह के विद्रोही और हत्यारे आदमी के पूर में स्वीकार करने से इनकार करता हूँ। भारतीयों ने बड़ी बैठकें कीं। बड़े भाषण थे। बड़े प्रस्ताव आए। सब निंदा में। लेकिन उस समय भी सावरकर ही ऐसे नायक थे, जिन्होंने उनका खुलकर समर्थन किया। सबसे पहले, उन्होंने उनके खिलाफ प्रस्ताव पास न होने देने के लिए एक बहाना पेश किया कि वह अभी भी मुकदमे में हैं और हम उन्हें दोषी नहीं कह सकते। अंत में जब इस प्रस्ताव पर वोट डाला गया तो सदन के अध्यक्ष बिपिन चंद्र पॉल कह रहे थे कि अगर इसे सर्वसम्मति से सभी द्वारा पारित माना जाता है, तो सावरकर ने खड़े होकर व्याख्यान देना शुरू कर दिया। तभी एक अंग्रेज ने उनके मुँह पर घूँसा मारते हुए कहा, “देखो अंग्रेजी घूँसा कितना सीधा लगता है।” पीछे से एक हिंदुस्तानी युवक ने अंग्रेज के सिर पर डंडा मार दिया और कहा, “देखो भारतीय डंडा कितना सीधा चलता है।” वहाँ शोरगुल था। बैठक बीच में ही छोड़ दिया गया था। प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

1926 में भगत सिंह ने पंजाबी हिंदी साहित्य सम्मेलन के लिए एक लेख लिखा। वह कहते हैं, “मुसलमानों में भारतीयता का बहुत अभाव है। इसलिए वे सभी भारतीयता के महत्व को नहीं समझते हैं और अरबी एवं फारसी लिपि को पसंद करते हैं। पूरे भारत की एक भाषा होनी चाहिए और वह भी हिंदी। जिसे वे कभी नहीं समझते हैं, इसलिए वे अपनी उर्दू की प्रशंसा करते रहते हैं और एक तरफ बैठते हैं।” आगे उसी लेख में भगत सिंह कहते हैं, “हम चाहते हैं कि मुस्लिम भाई भी अपनी आस्था का पालन करें, लेकिन भारतीय भी उसी तरह से बनें जैसे कमाल तुर्क। हाँ, यही केवल भारत को बचाएगा। हमें भाषा आदि के प्रश्नों को एक बहुत बड़े दृष्टिकोण के साथ देखना चाहिए, न कि इसे मार्मिक (धार्मिक) समस्याएँ बनाकर।”

भगत सिंह द्वारा प्रस्तुत ये विचार न केवल सावरकर के विचारों के अनुरुप हैं, बल्कि गुरुजी के ‘विचारों का गुच्छा’ के अनुसार भी है। यह साबित हुआ कि भगत सिंह ने सावरकर की पुस्तक “1857- स्वतंत्रता का युद्ध” का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और इसे क्रांतिकारियों के बीच प्रचारित किया गया। कुछ लेखकों ने दावा किया है कि सावरकर और भगत सिंह की मुलाकात रत्नागिरी में हुई थी, लेकिन इसकी कोई निर्विवाद पुष्टि नहीं हुई।

गाँधीजी के अनुयायी वाईडी फड़के के अनुसार, भगत सिंह ने सावरकर की ‘1857’ से प्रेरणा ली, लेकिन सावरकर की ‘हिंदुपदपादशाही’ को अनदेखा कर दिया। लेकिन अब यह भी पता चला है कि भगत सिंह ने भी हिंदुपदपादशाही से प्रेरणा ली थी। वह अपनी जेल डायरी में कई लेखकों के उद्धरणों को नोट करते हैं। इसमें केवल सात भारतीय लेखक शामिल हैं, लेकिन उनमें से केवल एक सावरकर हैं, जिनकी भगत सिंह ने अपनी डायरी में एक से अधिक उद्धरण शामिल किए हैं और सभी 6 के 6 उद्धरण एक ही किताब हिंदुपदपादशाही से है। जो कि इस प्रकार हैं-

  1. बलिदान केवल आराध्य था, जब यह सीधे या दूर से था, लेकिन यथोचित रुप से सफलता के लिए अपरिहार्य लगा। बलिदान जो अंतत: सफलता की ओर नहीं ले जाता है, वह आत्मघाती है और इशलिए मराठा युद्ध की रणनीति में कोई स्थान नहीं था। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 256)
  2. मराठों से लड़ना हवा से लड़ने जैसा है, पानी पर वार करना है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 258)
  3. जो हमारी उम्र की निराशा बनी हुई है, जिसे इतिहास को बिना लिखे, वीरता पूर्ण कार्य करने की क्षमता और अवसरों के बिना उन्हें जीवन में वास्तविक रुप देने के लिए गाना है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 245)
  4. राजनीतिक दासता को किसी समय आसानी से उखाड़ फेंका जा सकता है लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व की बेड़ियों को तोड़ना मुश्किल है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 242-43)
  5. कोई स्वतंत्रता नहीं! जिनकी मुस्कान से हम सभी इस्तीफा नहीं देंगे। जाओ हमारे आक्रमणकारियों, Danes को बताएँ, यह आपके मंदिर में एक उम्र के रक्त के लिए मीठा है। सोने से पहले लेकिन जंजीरों में एक मिनट। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 219)
  6. बदले की आग में मर जाओ, यह उस समय हिंदुओं के बीच प्रचलित कॉल था। लेकिन रामदास उठकर खड़ा हो गया। नहींं, इस प्रकार नहीं। रुपांतरित होने के बजाय मारा जाना काफी अच्छा है, लेकिन उससे बेहतर है कि न तो मारे जाएँ और न ही हिंसक रुपांतरित हों। बल्कि हिंसक ताकतों को मारें और धार्मिकता के कारण पर विजय प्राप्त करने के लिए मारते हुए मारे जाएँ। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 1141-62)
भगत सिंह द्वारा प्रस्तुत समाजवादी हिंदुस्तान के विज्ञान आधारित राष्ट्र का चित्रण सावरकर के विज्ञान आधारित हिंदुस्तान के करीब है। नेहरू के प्रतिपादन का उनका समर्थन कि वे कुरान और वेद अलग-अलग रखकर विज्ञान को स्वीकार करते हैं, हमें सावरकर द्वारा इसी तरह के प्रतिपादन की याद दिलाते हैं। अपने 750 पन्नों के लेख में भगत सिंह ने सावरकर, उनके हिंदुत्व या ब्रिटिश परिस्थितियों को स्वीकार करने की आलोचना नहीं की है। बहरहाल, उन्होंने हिंदुओं के पक्ष में मुसलमानों की हत्या का समर्थन करने वाले दंगाइयों की आलोचना की है। लेकिन वे सावरकर के लिए अभिप्रेत नहीं हैं और सावरकर पर भी लागू नहीं होते हैं। भगत सिंह के सहयोगी यशपाल ने कहा है कि सावरकर बंधु क्रांतिकारी आंदोलन में हमारे नेता थे।

सावरकर और भगत सिंह दोनों ने काकोरी कांड पर लेख लिखे हैं। दोनों के पहले लेखों में अशफाक का उल्लेख नहीं है। सावरकर ने बाद में अशफाक पर एक और लेख लिखा है। भगत सिंह ने अपने दूसरे लेख में अशफाक का उल्लेख किया है। मदनलाल, अंबाप्रसाद, बालमुकुंद, सचिंद्रनाथ, कूका जैसे क्रांतिकारी सावरकर और भगत सिंह दोनों के लेखन के विषय हैं। सावरकर ने लाला लाजपतराय पर 20 दिसंबर 1928 को हुए हमले की निंदा करते हुए एक लेख लिखा था। हमले में लगी चोटों से लाला लाजपतराय की मौत हो गई। इस से बदला लेने के लिए सांडर्स को भगत सिंह और उनके साथियों ने मार डाला। महात्मा गाँधी ने इसे कायरतापूर्ण कृत्य बताया। सावरकर ने 19 जनवरी 1929 को गाँधी जी के कथन की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा। साथ ही, उन्होंने लाला लाजपतराय के साहित्य पर भी एक प्रसिद्ध लेख लिखा।

सावरकर ने अपने साहित्य में भगत सिंह और उनके साथियों का कई बार उल्लेख किया है। सावरकर के श्रद्धानंद में ‘आतंक का असली मतलब’ शीर्षक से एक लेख मई 1928 में भगत सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा कीर्ति में प्रकाशित किया गया था। भगत सिंह और साथियों के समर्थन में वीर सावरकर द्वारा लिखित एक लेख का शीर्षक ‘सशस्त्र लेकिन अत्याचारी’ बम के दर्शन के नाम पर इसी तरह का एक लेख भगत सिंह और वोरा द्वारा 26 जनवरी, 1930 को प्रकाशित किया गया था। फड़के का कहना है कि इस तरह के लेखों के साथ सावरकर युवाओं के दिलों में चिंगारी भड़का रहे थे। 8 अक्टूबर, 1930 को सावरकर के सहयोगी पृथ्वी सिंह आजाद और भगत सिंह के सहयोगी दुर्गाभि ने मुंबई के एक हवलदार के यहाँ शूटिंग की। इससे सावरकर के निरोध के कार्यकाल में वृद्धि हुई। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। उस समय भी सावरकर ने एक कविता लिखी थी।

रत्नागिरी में सावरकर के घर पर हमेशा भगवा झंडा फहराया जाता था। उनके घर का पता केवल इशी से पहचाना जा सकता था। हालाँकि, 24 मार्च को सावरकर को घर पर एक काले झंडे को प्रदर्शित किया गया था। इसे समझना सरकार के लिए मुश्किल नहीं था। सावरकर द्वारा लिखे गए कविता को गाते हुए रत्नागिरी के बच्चों ने 24 मार्च को एक जुलूस निकाला, जब सावरकर वरवडे नामक एक गाँव में आए। उन्होंने 25 मार्च को वापसी की और काला झंडा फहराया। सावरकर ने चार महीने के भगत सिंह को याद करते हुए एक लेख प्रकाशित किया। मौका था नेपाली आंदोलन का। भगत सिंह, शिव वर्मा, वोरा आदि के अन्य साथियों ने भी क्रांतिकारियों पर सावरकर के प्रभाव के बारे में लिखा गया है।



Source- opindia

वीर सावरकर: वह लेखक, जिसकी किताब बेच बंदूकें खरीदते थे आज़ादी के परवाने

न ही भाजपा-संघ वाले स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में बात करते थकते हैं और न ही कॉन्ग्रेस वाले हिन्दू महासभा के नेता रहे विनायक दामोदर सावरकर में नुक्स निकालते। इन दोनों राजनीतिक ध्रुवों के बीच जो खो जाता है, वह है लेखक, इतिहासकार, विचारक सावरकर- जिसने शायद एक व्यक्ति या नेता से आगे जाकर भारत में ब्रिटिश शासन की जड़ें खोद दीं। 

जिसने दशकों बाद पहली बार भारत-भूमि को याद दिलाया कि 1857 में महज कुछ दिशाहीन, अनुशासन-विहीन सैनिकों की हिंसा नहीं, स्वतंत्रता का पहला संग्राम हुआ था। जिसके ‘मास्टर-प्लान’ पर काम करते हुए बारीन्द्र घोष, शचीन्द्रनाथ सान्याल, रासबिहारी बोस आदि ने अपनी उम्र झुलसा दी और बिस्मिल, बाघा जतीन, राजेन्द्र लाहिड़ी आदि अनगिनत वीरों ने प्राणोत्सर्ग किया।

 जिसकी प्रेरणा से अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद कॉन्ग्रेस में हाशिये पर धकेल दिए गए सुभाष चन्द्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज के ‘नेताजी’ बनने नजरबंदी से भाग निकले। 

जिसकी किताबें इतनी लोकप्रिय थीं कि भगत सिंह उसकी प्रतियाँ बेचकर बंदूकें खरीदने का पैसा जुटा सकते थे!

‘1857 दोहरा कर ही मिलेगी आज़ादी’

1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों ने जो क्रूरता और निर्ममता दिखाई थी, वह अनायास या अकारण ही नहीं थी। पूरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था ब्रिटिश सेना के संरक्षण पर टिकी थी और ब्रिटिश सेना (चाहे वह ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो या बाद में ब्रिटिश क्राउन की) में केवल मुट्ठी-भर अंग्रेज अफ़सर होते थे- भारतीयों को विदेशियों का गुलाम बना कर रखने वाली असली ताकत भारतीय सैनिक ही थे; उन राजाओं की सेनाओं के, जिनकी कम्पनी बहादुर या ब्रिटेन के राजपरिवार के साथ संधि हुई थी, या सीधे ब्रिटेन की गुलामी में पड़े हुए भू-भाग की ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिक। 

अतः 1857 को क्रूरता से कुचलना अंग्रेजों के लिए ज़रूरी था, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक किसी सैनिक के दिमाग में अपने गोरे मालिकों पर बंदूक तानने की जुर्रत न आए। इसीलिए उन्होंने न केवल लोमहर्षक निर्ममता के साथ इस संग्राम को कुचला (किवदंतियाँ हैं कि मंगल पाण्डे के घर वालों की पहचान करने में नाकाम रहने पर उन्होंने कानपुर से बैरकपुर तक के हर गाँव के हर पाण्डे उपनाम वाले बच्चे-बूढ़े-औरत को गाँवों के पेड़ों से फाँसी पर लटका दिया था), बल्कि इतिहास में इसे अधिक महत्व न देते हुए महज़ एक अनुशासनहीन विद्रोह के रूप में दिखाया। 

वह सावरकर ही थे जिन्होंने पहले मराठी और फिर अंग्रेजी में प्रकाशित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’/The Indian War of Independence के ज़रिए इस लड़ाई के असली रूप को जनचेतना में पुनर्जीवित किया।

1909 में प्रकाशित इस किताब में उन्होंने न केवल इस विद्रोह की राजनीतिक चेतना को रेखांकित किया बल्कि इसके राष्ट्रीय स्वरूप के पक्ष में भी तर्क रखे। यही नहीं, उन्होंने यह भी अनुमानित कर लिया था कि अगर भारत को ब्रिटिश शासन के चंगुल से मुक्त होना है तो अंततः यही रास्ता फिर से पकड़ना होगा। ब्रिटिश सेना को पुनः राष्ट्रवादी, देशभक्त सैनिकों से भरना होगा जो वर्षों तक चुपचाप सेना में अपनी पैठ बनाएँ, प्रभुत्व स्थापित करें, अन्य सैनिकों की निष्ठा विदेशी शासन से इस देश की जनता की ओर मोड़ें। अंत में जब संख्याबल आदि सभी प्रकार से मजबूत हो जाएँ तो अपने नेता के इशारे पर, सही समय पर विद्रोह कर दें। महत्वपूर्ण रणनीतिक संसाधनों, हथियारों, रसद, आपूर्ति मार्गों आदि पर कब्ज़ा कर अंग्रेजों की व्यवस्था को घुटने पर ले आएँ।

सारे जहाँ में प्रतिबंधित

बौखलाए अंग्रेजों ने किताब और सावरकर पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। लंदन के सभी प्रकाशकों को इस किताब के अंग्रेजी अनुवाद/संस्करण के प्रकाशन के खिलाफ़ आगाह कर दिया गया। फ़्रांस ने भी अंग्रेज़ी दबाव में घुटने टेक दिए। अंततः किताब का अंग्रेज़ी संस्करण हॉलैंड (अब नीदरलैंड) में प्रकाशित हुआ- वह भी इसलिए कि ‘काली’ और ‘भूरी’ दुनिया को गुलाम बनाने में इंग्लैण्ड और हॉलैंड में ऐतिहासिक दौड़ मची थी। दोनों एक-दूसरे के औपनिवेशिक शासन को कमजोर करना चाहते थे। इस किताब को भारत में बाँटे जाने के लिए ब्रिटिश साहित्य के पन्नों में छिपा कर, या उसकी जिल्द चढ़ाकर लाया जाता था।

पीटर होपकिर्क अपनी किताब On Secret Service East of Constantinople में लिखते हैं कि इसके बाद अंग्रेजों ने सावरकर की किताब को ब्रिटिश लाइब्रेरी की सूची तक में जगह नहीं दी, ताकि भारतीय छात्रों को इसके बारे में पता न चल जाए। इसी किताब में वह यह भी बताते हैं कि सावरकर की किताब को ‘तस्करी’ कर भारत में लाने के लिए चार्ल्स डिकेंस का मशहूर उपन्यास ‘पिकविक पेपर्स’ काफ़ी इस्तेमाल हुआ है।

भगत सिंह

भगत सिंह ने न केवल सावरकर के साहित्य का खुद गहन अध्ययन किया (उनकी जेल डायरियों और लेखन में सावरकर से अधिक उद्धृत केवल एक लेखक हैं), बल्कि कई इतिहासकारों की राय है कि वे अपने क्रांतिकारी संगठन में भी सावरकर के अध्ययन को प्रोत्साहित करते थे। यही नहीं, सावरकर की ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ और इसके अंग्रेजी संस्करण की आमजन के बीच भारी माँग और प्रतिबंध के चलते आपूर्ति में किल्लत को देखते हुए भगत सिंह के इसकी व्यवसायिक पैमाने पर तस्करी करने के भी उद्धरण इतिहास में मिलते हैं। इस किताब को ऊँचे दामों पर बेचकर उनका संगठन अंग्रेजों के खिलाफ़ क्रांति के लिए हथियार खरीदने का धन उगाहता था। इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित करवाने में भगत सिंह की भूमिका का ज़िक्र विक्रम सम्पत द्वारा लिखित सावरकर की जीवनी में है। यही नहीं, भगत सिंह ने सावरकर की केवल इस किताब ही नहीं, ‘हिन्दू पदपादशाही’ का भी ज़िक्र अपने लेखन में किया है।

सावरकर भी भगत सिंह का काफी सम्मान करते थे। इसकी एक बानगी यह है कि सावरकर की मृत्यु के उपरांत 1970 में प्रकाशित उनकी जीवनी ‘आत्माहुति’ का विमोचन भगत सिंह की माता माताजी विद्यावती देवी के हाथों हुआ। इस समारोह में उनके छोटे भाई भी शरीक हुए थे।

आज यह कतई ज़रूरी नहीं है कि जो कुछ सावरकर ने लिखा है, वह सही ही हो। बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जो उस समय भले सही रहा हो, लेकिन आज प्रासंगिक न हो। सावरकर के जीवनकाल में ही ‘हिंदुत्व’ और हिंदूवादी राजनीति की उनसे अलग परिभाषाएँ रहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के हिन्दू महासभा छोड़ने के पीछे एक महती कारण पाकिस्तान को लेकर उनमें और सावरकर में पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने (डॉ. मुखर्जी का मत) बनाम पुनः एक दिन अखण्ड हिंदुस्तान की सावरकर की परिकल्पना का गंभीर मतभेद था। ‘हिंदुत्व’ शब्द सावरकर के पहले भी था और सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह कई बार साफ़ किया है कि आज का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोलवलकर-सावरकर से आगे बढ़ चुका है। ऐसे में यदि सावरकर को यदि जीवित रखना है तो उनके प्रशंसकों, उनके अनुयायियों को उन्हें दोबारा पढ़ना होगा, उन्हें दोबारा ‘खोजना’ होगा।

Future of Remote Work

Communication Technology and Inclusion Will Shape the Future of Remote Work

In the past, remote employees have had a bad reputation. Many employers believed their workforce would be too easily distracted at home, where their managers couldn't keep an eye on their direct reports.

Remote work was very rare a decade ago. Working from home was usually only available as a special arrangement to accommodate families in specific cases. However, teleconferencing and telework technology have advanced to the point where some businesses thrive with completely remote teams. In fact, it's not uncommon for businesses to allow their employees to work from home once or twice a week.

Remote work can also help prevent the spread of illness, helping companies avoid lost productivity and protecting public health. For example, the outbreak of COVID-19 prompted many employers to shift to a remote work model for all employees possible in a bid to limit the spread of the coronavirus.

To determine the effectiveness of communication technology and working remotely, we'll examine the history of working remotely, the current state of the workforce, and predictions for the future of remote employment.

Is remote working effective?

A decade ago, most employers would have balked at the idea of employees regularly working from home. One major concern most employers had for working remotely was a loss of productivity. How productive and efficient can an employee be when they're not under constant supervision by co-workers and supervisors? 

To better understand the effectiveness of remote work, Airtasker surveyed 1,004 full-time employees – 505 of whom were remote employees – throughout the U.S. about their work habits and productivity. The results indicate that remote workers are actually more productive than their office-based counterparts. The study found the following: 

·         Remote employees work an additional 1.4 more days per month than in-office employees, which is nearly 17 additional workdays a year.

·         Remote employees take longer breaks on average than office employees (22 minutes versus 18 minutes, respectively), but they work an additional 10 minutes a day.

·         Office workers are unproductive for an average 37 minutes a day, not including lunch or breaks, whereas remote employees are unproductive for only 27 minutes.

·         15% of remote workers said their boss distracted them from work, which is less than the 22% of office-based employees who said the same thing. 

While these statistics may encourage both employees and employers to implement a work-from-home program, remote employees also reported higher levels of stress and more difficulty finding work-life balance than office-based workers. However, according to the American Psychological Association, remote work can increase employee satisfaction when implemented correctly. 

Ultimately, working remotely is effective, but it has to be put into practice correctly, and it may not be the best situation for every employee or every business. 

How remote work has evolved

There was a time when remote work as we know it wasn't even a possibility, because the technology didn’t exist. If your colleagues and business partners wanted to get in touch with you when you were out of the office, they couldn't email, text or direct-message you. You would've needed to provide an alternative phone number, a pager or even a fax number to have a work-related conversation. Even full-time "remote" positions were different from what they are today.

"Ten years ago, remote employment basically meant a telemarketing or customer service position at below minimum wage," said Samantha Lambert, director of human resources at website design company Blue Fountain Media. "It rarely was connected with a full-time career. Now, technology affords us the ability to get the same job done, no matter where in the world we are. It has enabled us to be in contact with co-workers or clients at any time."

One of the most helpful technologies for seamless remote work is video conferencing. Live video feeds help out-of-office workers see and speak to one another in real time, anywhere with an internet connection, which is the next best thing to a face-to-face meeting. But this capability wouldn't be possible without the widespread broadband internet adoption of the past 10 to 15 years.

This technology has advanced so quickly that many companies have even done away with traditional offices and instead run their businesses out of coworking spaces to accommodate their largely remote workforce.

"Shared office spaces, where remote employees can gather to work, have been created and are more widely available in different cities," Lambert said. "This in itself represents the growing amount of remote workers in recent years."

Remote work also presents unique opportunities in the face of crisis, such as a natural disaster or an epidemic. For instance, as COVID-19, commonly known as the coronavirus, rapidly spreads worldwide, the ability for many workers to perform their job duties entirely from home can help protect both the public health and the continued success of the business.

The current state of remote work

Because of these advances in communication technology and internet access, teleworking has become an accepted practice in many offices, both in the U.S. and globally. This type of work isn't done entirely from home: Remote workers turn to coffee shops or co-working spaces, and some even travel the world while maintaining their career goals.

"The modern workforce is increasingly mobile, collaborative [and] dynamic, and comprises multi-generations, all with differing communication preferences," said Stacey Epstein, CEO of Zinc. "These workers span multiple industries … all who represent unique challenges when it comes to staying connected while on the job."

However, many companies have resisted this work trend for various reasons. Some business owners may fear a lack of productivity in their employees, while others haven't invested in teleconferencing and telework tech to support remote workers. Still, many other businesses have dipped their toes in the remote workforce by creating a work-from-home policy for one or two days a week, or as an exception for a few employees.

According to a survey by Buffer on remote work, 75% of remote workers said their companies don't cover internet costs, and 71% said their employers don't pay for co-working spaces for their employees. These stats are marginally better than the previous year, in which 78% of companies didn't cover internet costs and 76% didn't pay for co-working spaces. While the desire and expectation of working remotely increases significantly every year among the workforce, companies are only slowly adopting remote-friendly policies.

On the other hand, adopting a remote working policy can save companies money by removing the need for expensive office space (or satellite offices) while allowing workers the freedom to create their own schedules and work from wherever they please. It can be a win-win situation.

What the future holds

Fast Company predicts that remote work software, like mobile work tools and virtual reality conferencing, will become the preferred form of communication – even over face-to-face meetings. AI will also likely play a major role in managing remote staff.

These advancements might put companies more at ease. The transition to managing a remote workforce might be daunting, but with the right tech and hardworking employees, it can be a seamless process.

In the long run, fighting the change may do more harm than good. Many employees now expect remote work opportunities. According to Buffer, 99% of current remote workers would like to work remotely, at least some of the time, for the rest of their careers. That's nine points higher than the figure from the same survey in the previous year.

Furthermore, according to Global Workplace Analytics, 37% of remote employees would take a 10% pay cut to continue working from home. Because of this increasingly popular trend, some refuse to accept an onsite position, knowing they can find a more convenient and flexible gig elsewhere.

Instead of resisting the change, organizations should improve their remote work policies and capabilities. If your company is concerned about productivity and performance issues due to a companywide ability to work from home, Lambert recommends creating standard key performance indicators (KPIs) for both management and employees. This way, she said, remote team members are aware of expectations, and their performance can be monitored.

 


Economic Package Of 20 Lakh Crores: Lockdown 4.0

Prime Minister Narendra Modi announced a Rs 20 lakh crore economic package for what he called "Mission Self-Reliant India" to tide over the coronavirus crisis. "This package is for migrants and farmers who work for the nation day and night, no matter the circumstances," the Prime Minister said, addressing the nation. The special economic package would be the main component of "Atma-Nirbhar Bharat (self-reliant India)", he said.


Following are the highlights of PM Modi's address:

It has been over 4 months that the world is battling coronavirus. 42 lakh have been infected globally. Over 2.45 lakh have died. In India, many have lost their loved ones. I offer my condolences.

One virus has led to global upheaval. Globally, crores of lives at stake.

Entire world in a way, fighting a battle, working to save lives. This is an unprecedented crisis.

Getting exhausted or accepting defeat not an option.

We need to save lives and move forward at the same time.

We have to remain careful and follow rules to live and move ahead. Now that the world is in a crisis, we have to be more resolute. Our resolve will be greater than the crisis.

We need to strengthen our resolve. Since last century, we've been hearing that 21st century belongs to India. The global scenario, we are tracking developments. When we see it from India's prism, it looks like that it is not just a dream, we are responsible to ensure that 21st century belongs to India.

Self-reliance is imperative. Self-reliant India is the only way out.

We stand at a crucial juncture. This crisis has a message for India, an opportunity. I'd try explaining using an example. When the crisis started, not a single PPE kit was made in India, N-95s were produced in negligible numbers. Today, in India, 2 lakh PPEs and 2 lakh N-95s being produced.

India, as this example demonstrates, turned crisis into an opportunity.

The meaning of self-reliance has changed, the global definition is changing. India's heritage, culture talk about self-reliance, the essence being 'the world is one'.

India's self-reliance takes into account global peace and coordination. Our heritage, our motherland, when we become self-reliant, it increases the prospects of safe and prosperous world.

When India became open defecation free, the world changed. Be it tuberculosis, malnutrition or polio, India's action impacted the world. International Solar Alliance is India's gift to the world in the fight against global warming. India's medicines serving as ray of hope in today's times.

The world has started to believe that we can fare very well, that we can contribute in upliftment of humanity. We have had a glorious past. We were dubbed 'sone-ki-chidiya'. Times changed, we yearned for development. We are taking steps towards development today.

Today, we have the resources, the will, we have fine talent. We will manufacture best products, improve quality and modernise the supply chain, we can do this and we will.

During Kutch earthquake, there was rubble wherever you looked. Nobody could contemplate back then that things would improve, but Kutch regained and revived. If we pledge, no target is impossible, no route is tough; and today, we have the will.

India can become self-reliant. This would be based on 5 pillars:

1) Economy: An economy that takes quantum jumps and not incremental gains.
2) Infrastructure: Infrastructure is synonymous with a modern India.
3) Our system: A system that helps us realise dreams, which is based on tech-driven facilities.
4) Demography: Vibrant demography our strength.
5) Demand: The demand and supply chain, we need to utilise the potential. We need to increase demand in the nation. Each stakeholder must be active.

Announcing a special economic package in a bid to make India self-reliant. An important link. Around Rs 20 lakh crores. Around Rs 20 lakh crores which is around 10% of GDP. Package addresses sectors on which crores depend for livelihood.

Package for farmers, for workers, who irrespective of circumstances, work for the nation. Package for MSMEs, who pay taxes sincerely and contribute. Package for Indian industry. From tomorrow, Finance Minister Nirmala Sitharaman will inform in detail.

This signifies bold reforms, we must move forward. In the last six years, the reforms undertaken, today, in crisis, we are much better off.

Who could imagine earlier that money sent by government reaches farmers in full? This imagined when there was no transport, offices were shut.

The reform is in a bid to ensure that such a crisis impacts agriculture in the least possible manner. In a bid to enhance Human Resources and bid to strengthen financial system. These reforms will attract investment and help Make In India.

We need to compete for a place in the global supply chain. We must play a big role in global supply chain. Keeping this in mind, various provisions have been made, which will lead to increased efficiency across sectors.

Hawkers, workers, helps - they have faced difficulties in this time and have made sacrifices. Our duty now to make them better off, to work to further their interests. Keeping this in mind, be it poor, be it workers, be it fishermen, be it from formal or informal sector, certain key announcements will be made.

Local manufacturing, local supply chain: We realize the importance now. Local met our demands, local saved us. Brands that are global were once similarly local. When people used them and these were branded, they became global from local. It's time to be vocal for local.

We need to buy local products and spread the word. I am sure that we can do this. Your efforts have only increased my faith in you. I am proud to recollect that I had asked citizens to buy khadi and to support handloom workers; and in a short time, demand and sales touched record levels. You made it a big brand too. We got the results; and good results.

Scientists and experts say that coronavirus will stay with us for long, but we can't make our lives revolve around this. We will wear masks, maintain distance, but not lose sight of our targets.

In Lockdown 4.0, we will follow norms, fight COVID-19 and move ahead. It will be based on suggestions by the state. Details will be informed by May 18 after suggestions from state. We will fight and move forward by following rules. Our responsibility to make India a self-reliant India will be powered by the energy of the 1.3 billion population. With new energy and new determination, we need to move ahead. Who can stop us then? We can make India self-reliant; and we will. With faith and hope, I urge citizens to take care of their health and the ones around them.